पूर्णा पश्वाद्भुत पूर्णा पुरस्तादुन्मध्यतः पौर्णमासी जिगाय ।
तस्या दे॒वैः संवस॑न्तो महित्वा नार्कस्य पृष्ठे समिषा मंदेम ॥ अथ. ७.८०.१
तर्जः पहाटे झाली उठा उठा राग ललित
उदित हुई है पूर्णमासी (2)
गगनांगन में चन्द्रदेव हँसे
फैली चारों ओर ही हाँसी
॥ उदित हुई॥
शीतल चाँदनी छटकी चहूँ दिशी (2)
सौम्य प्रकाश की मिली अनुदृष्टि (2)
शांत आह्लादक अमृत बरसे।
चन्द्र किरणों के बने अवासी ॥
॥ उदित हुई॥
पूर्णिमा जागी आध्यात्म-लोक में (2)
चारु-चन्द्र जगा, मन की ओक में (2)
सौम्य चन्द्रिका फैली अन्तर में (2)
मन की वृत्तियाँ बनीं प्रतापी॥
॥ उदित हुई ॥
शीतल मञ्जुल किरणों से ही (2)
हृदय सुक्षेत्र भरपूर हो गया (2)
सत्य पथिक हो जगीं इन्द्रियाँ
श्रद्धा बन गई मन की साथी॥
॥ उदित हुई॥
आत्मा भी सुख ज्ञान में जुटा (2)
मन शुभ संकल्पों में लगा (2)
श्रवण मनन निदिध्यासन द्वारा
इच्छा दर्शन की भी जागी
॥ उदित हुई॥
अङ्ग-अङ्ग में पूर्णता जागी (2)
त्रुटियाँ छिद्र न्यूनता भागीं (2)
पूर्णाध्यात्मिक आत्मनुरागी
दिव्यानन्द का बना प्रवासी ॥
॥ उदित हुई॥
(अनुदृष्टि) दयादृष्टि (गगनांगन) आकाश का प्रांगण, (आह्ह्लादक) प्रसन्न करने वाला।
(चारु) सुन्दर मनहर, (न्यूनता) कमियाँ, (सौम्य) शांत, गम्भीर, (प्रवास) रहने का स्थान। 26










