स घवा॑ नो देवः स॑वि॒ता साविषद॒मृता॑नि भूरि॑ि ।
उभे सुष्टुती सुंगातवे ॥३॥
अथर्व. ६.१.३
तर्जः परयान मरन्न परिभवंगल विरहार्द्रमा-1425 राग-जोग
करना प्रसन्न परमेश्वर! (२)
मन तेरी शरण को तरसाये स्मरण करेंगे हर दम तुझको (२)
तेरी कृपा हमें राह दिखाये ॥
॥ करना प्रसन्न ॥
सच्चिदानन्द तेरी महिमा ऽऽऽ (२)
करती प्रेरित हमें है तेरी
पावनी, ज्ञान की गंगा (2)
करे आत्मा को ज्ञानापन्न
वाह रे! मेरे भगवान !
गऽऽ सागनी सापऽपनी सामधसा नीसागमपगमपनी सां सा
ऽ ऽ नी पमग, नी प म ग ऽऽ
करे अनेक जगत कृपा तारो हमें भी हे प्रभो!
करना प्रसन्न…
पाते तुमसे हम सौभाग्य
सोम की धारों से
प्रभु की ही गा स्तुति
दोनों प्रकारों से (2) (गद्यपद्य)
गद्य हो या गीत भजन
हृदय हो साधन
योग-सुधा का पी कर अमृत
करना प्रसन्न….
पा परमानन्द को ॥










