उस दर्शनीय को मैंने देख लिया है दर्श नु वि॒िश्वद॑र्शतं दर्श रथ्मधि क्षमिं । एता जुषत मे गिरेः॥
ऋ. १.२५.१८
तर्जः परयादे मइयन पुईरे, निरयुम
प्रभु तेरे दर्शन हो गए, आनन्द के बादल बरसे
उल्हास भी ऐसा जागा जिसके लिए थे तरसे
प्रभु तुम हो ‘विश्वदर्शन’ सब दुरित तुम्हीं तो हरते॥
॥ प्रभु तेरे दर्शन ॥
आज तो मैंने देख लिया मानो अद्भुत रथ है मिला
जिसपे बैठ के मैं संसार के, दुर्गम मार्ग को छोड़ चला
अब कोई कष्ट ना कष्ट रहा
मेरी भक्ति भरी वाणी सुन ली जिसने प्रभु तुझे रिझा दिया
॥ प्रभु तेरे दर्शन॥
प्यारे वरुण तो देखने लायक, दुःख हरते सबके सुखदायक
उनको देते हैं दर्शन जिसका मन-हृदय है पावक
प्रभु दर्शन के ऐ साधक !
क्या हृदयोद्गार उल्हास का
जज़्बा तेरा हृदय दिखा सका?
(दुरित) पाप, (दुर्गम) कठिन, (पावक) पवित्र, (उल्हास) आनन्द, हर्ष, प्रकाश।










