महाधन नाथूराम जी

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महाधन नाथूराम जी हैदराबाद ( सिंध) के निवासी थे । उनका जन्म एक सम्भ्रान्त सारस्वतब्राह्मण परिवार में 9 अप्रैल सन् 1908 में हुआ था। पिता जी का शुभ नाम श्री पं० कीमतराम जी था। श्री नाथूराम जी अपने पिता के इकलौते पुत्र थे। उनके पिता उनसे अत्यधिक स्नेह करते थे तथा किसी प्रकार का उन्हें कष्ट नहीं होने देते थे। बचपन से ही वे मन मौजी ढंग से चलने वाले तथा गम्भीर प्रकृति के थे।

सन् 1927 में श्री नाथूराम जी श्रार्यसमाज की ओर आकृष्ट हुए। उनके पिता जी तथा अन्य सम्बन्धी उनके आर्यसमाजी होने के कारण बहुत रुष्ट हुए। परन्तु उन्होंने इसकी परवाह नहीं की तथा कार्य में लगे रहे। जब 1929 में हैदराबाद सिध में आर्ययुवकसमाज खुला तो आप उसके उत्साही सदस्य बने । इस समय आर्यसमाजी और सनातनियों के बीच तनातनी थी। इसमें श्री नाथूराम जी ने अच्छा भाग लिया। वे सनातनर्धार्मयों का समाधान किया करते थे ।

सन् 1931 में अहमदी फिरके की एक अञ्जुमन बनी। इस अञ्जुमन ने कुछ इश्तिहार निकाले जिनमें हिन्दू धर्म और हिन्दू वीरों पर गन्दे आक्रमण व आक्षेप किये गये थे। इन्हें पढ़कर श्री नाथूराम जी के हृदय में मन्यु का वेग उत्पन्न हुआ. जोश का तूफान उठा। उन्होंने इसका उत्तर देने का निश्चय किया। उन्होंने ‘तारिखे इस्लाम’ का उर्दू से सिन्धी में में अनुवाद किया। फिर विज्ञापनरूप से एक ट्रैक्ट निकाला जिसमें मुसलमान मौलवियों से बहुत से प्रश्न पूछे गये थे। ये दोनों पुस्तकें मुफ्त बांटी गईं। उन पुस्तकों के प्रकाशन के बाद मुसलमानों में खलबली मच गई। उन लोगों ने भिन्न भिन्न स्थानों पर इनके विरुद्ध आन्दोलन किया। मुल्ला मौलवी और मुस्लिम सम्पादकों ने भी महाधन नाथूराम के विरुद्ध खूब भाग लिया। इन हलचलों और विरोधों का यह परिणाम हुआ कि गवर्नमेंट ने सन् ३३ में उन पर मुकदमा चलाया। श्री नाथूराम जी ने मुकदमा लड़ते हुए यह सिद्ध किया कि ‘वह पुस्तक ईसाइयों की लिखी हुई है, मैंने उसका अनुवादमात्र किया है। इसके साथ ही उस पुस्तक के औचित्य में उन्होंने अन्य पुस्तकों के भी प्रमाण प्रस्तुत किये थे। परन्तु मजिस्ट्रेट ने उन्हें सेशन सुपुर्द किया। सेशन जज ने उन्हें १।। डेढ़ वर्ष की जेल एवं एक हजार रुपया जुर्माने का दण्ड दिया। इस सख्त सजा को सुनकर सारा सिंध कांप उठा। सेशन जज के फैसले के विरुद्ध चीफ कोर्ट में अपील दायर की गई।

२० सितम्बर सन् 1934 का दिन था। सारी कचहरी मनुष्यों से भरी थी। तिल धरने को जगह न थी। श्री महावीर नाथूराम जी के मुकदमे के सम्बन्ध में उस दिन जजों की बेंच ने अपना निर्णय देना था। लोगों के मनों में नाना प्रकार की विचारधारायें उत्पन्न हो रही थीं। सभी अपना अपना अनुमान लगा रहे थे। अचानक हो अदालत में एक दर्दनाक भयंकर चीख सुनाई दी। चारों तरफ हाहाकार मच गया। एक जनूनी पठान ‘अब्दुल कयूम’ ने जो श्री नाथूराम जी के पास बैठा था उनके पेट में छुरा भोंक दिया। उनकी अंतड़ियां बाहर निकल पड़ीं। धर्मवीर श्री नाथूराम जी उसी समय अमर पद को प्राप्त हो गये।

खूनी को उसी समय पकड़ लिया गया। डाक्टरी जांच के बाद श्री नाथूराम जी की अर्थी निकाली गई। चीफ जज ने सीस झुकाकर उनका सम्मान किया। अर्थी के साथ हजारों आदमी थे। बड़ी धूम-धाम के साथ उनका जलूस निकाला और वैदिक रीत्यनुसार अन्त्येष्टि संस्कार किया। सारे सिन्ध में हड़ताल हुई ।

खूनी पर केस चला और उसे फांसी की सजा दी गई। इस सम्बन्ध में एक बात उल्लेखनीय है जोमुसलमानों की मनोवृत्ति का दिग्दर्शन कराती है। खूनी अब्दुल कयूम की लाश कबर से उखाड़ी गई और कराची के मुसलमानों ने उसकी अर्थी को लेकर जलूस निकाला। मजहबी जोश में वे इतने उन्मत्त हो रहे थे, इतना हो हल्ला कर रहे थे कि प्रतीत होता था मानो सारा शहर लूटा जायेगा । उनकी इन प्रवृत्तियों से आशङ्कित होकर अधिकारियों ने फौज बुलाई और शहर को इनके आतङ्क सङ्कट से मुक्त किया ।

धर्मवीर नाथूराम जी की स्मृति में आर्य प्रतिनिधि सभा सिंध, आर्यसमाज करांची और सुशीला भवन करांची ने कुछ धन संग्रह किया। प्रतिनिधि सभा का एक फण्ड आज तक नाथूराम रक्षा निधि के नाम से प्रसिद्ध है जिससे संकटग्रस्त सिन्धी भाइयों की सहायता की जाती है।

श्री नाथूराम जी एक धीर, वीर, उत्साही आर्य थे। न्याय मार्ग पर चलते हुए वे किसी का भय बहीं करते थे। उनमें स्वाभिमान की मात्रा थी। हिन्दू जाति पर किये गये अश्लील आक्रमणों का उन्होंने वीरता से जवाब दिया। प्राण दिया पर मान नहीं दिया। अपने बलिदान से उन्होंने सिन्ध में नार्य जाति का मस्तक ऊंचा कर दिया है। उनका जीवन सिन्ध के आर्ययुवकों के लिये प्रकाश-स्तम्भका काम दे रहा है।