पव॑स्व सोम् मयु॑माँ ऋतावा॒पो वसानो॒ अघि सानो॒ अव्ये॑ ।
अव द्रोणानि घृतवर्वान्ति सीद मुदिन्त॑मो मत्सर ईन्द्रपार्नः ॥ साम. ५३२
तर्जः पदयात्र यो जिन्नम परयू सखी
ऐ मेरे मन मोहन, मधुरस तू पी
यज्ञ भावनायें जागीं, लहरें उठीं।
मिश्री शहद हुए फीके जब मन में श्रद्धा जगी॥ ॥ ऐ मेरे मन॥
देरे नात ने ना देरे ऽ ऽ दे रे नात देरे दा ऽ ऽ ऽ ॥2॥
उच्च शिखर पर हृदय की, भावुक लहरियाँ जा पहुँचीं
पराकाष्ठा चेतना की, हृदयाकाश में जा फैलीं
कितनी नशीली हैं लहरें इन्द्र तू इसमें जा बह ले
इस देह की अयोध्या में, इन्द्रिय कलश में, सोम रस तू पी॥
मधुर रस तू पी, यज्ञ भावनायें जागीं लहरें उठीं। ॥ ऐ मेरे मन॥
इन्द्रिय-कलश ये तो बरबस, दिखते हैं सूखे काठ से
किन्तु श्रद्धा का रस परिपूर्ण, भर दिया जब भी पात्र में
पात्र घृत रस से बना चिकना लाजिम है इस रस का टिकना
सोम रस होता है घृत सम, ये स्निग्धता ही है निरति,
मधुर रस तू पी, यज्ञ भावनायें जागीं, लहरें उठीं। ॥ऐ मेरे मन॥
ये मेरे नेत्र कर्ण जिह्वा, सोम की बाट जोह रहे
रोम रोमाञ्चित, स्नेहित प्राण, स्नेह भरी दृष्टि पोस रहे
सोमरस चमको बरसो, बीते कई अरसों बरसों
खड़े हम प्रतीक्षा में मोहन। कब से ये आँखें हैं तरसी ॥
मधुरस तू पी, यज्ञ भावनायें जागी, लहरें उठीं ॥ ॥ ऐ मेरे मन॥
मधुमय नशीली ऋतवती लहरों से भर दो सबका मन
ओढ़ के आओ तुम ओढ़नी हर्षित तरङ्गों की मोहन !
काठ-कटोरों में आओ, प्यासी आत्मा को सरसाओ
प्रेम सनी प्याली आत्मा के होठों पे रख दो हर घड़ी॥
मधुरस तू पी, यज्ञ भावनायें जागी, लहरें उठीं ॥ ॥ ऐ मेरे मन॥
(पराकाष्ठा) अत्यन्त ऊँचाई, (लाजिम) आवश्यक, (निरति) अगाध प्रेम, (बरबस) अचानक,
(पोस) पालन करने का अगाध प्रेम, (ऋतवती) नियम का पालन करने वाला।










