द्वा सु॑प॒र्णा सुयुजा सवा॑या समानं वृक्षं परि षस्वजाते।
तयो॑र॒न्यः पिप्पलं स्वा॒छत्त्यन॑श्रन्न॒न्यो अ॒भि चाकशीति ॥
ऋ. १.१६४.२
तर्ज : पंखिड़ा ने आ पींजरूँ (गुजराती भजन)
देह नं धायूं पींजरूँ हवे शुं एनूं काम
जनम ना थाक्या हंसला, उड़ी जा ले विश्राम॥
पंखीड़ा ने उड्या विना सूनूं सूनूं लागे
मड्युं छे पंख एक ज्ञान नूं, बीजूं कर्म माटे॥ पंखिड़ा ने॥
वृक्ष ओटले आ जगत्, अथवा तो शरीर (२)
एना पर बेठा पंखियो, ब्रह्म, बीजो जीव
ब्रह्म बेठो भोग विना ने जीव फड़ चाखे ॥ मड्युं छे॥
केम पड्यो जीव माँदो, झाड़ उपर शोक मां (२)
एने तो उड़ी ने जावू हतूं इन्द्र लोक मां
पगलां सकड़ाई लीधा, आशू कीधूं पापे ॥ मड्युं छे॥
जीव ब्रह्म बन्ने राखे, धर्म नी प्रतिष्ठा (२)
एक जन्म भोगे बीजो आ-जगत नो स्रष्टा
एक डाड़े बन्ने मित्रो बेठा साथे साथे ॥ ॥ मड्युं छे॥ (२)
आ जगत ना हॉटेल मां प्रभु सेवा बहू कीधी (२)
जीव पांख फेलावी ले, दिशा आनन्द नी सीधी
उड़ी जाजे ऐ पेल्ला जो जगत तने फाँसे ॥ मडूयुं छे॥










