वनीवानो मम दूतास इन्द्रं स्तोमाश्चरन्ति सुमतीरियानाः ।
हदिस्पृशो मनसा वच्यमाना अस्मम्यं चित्रं वृषणं रयि दाः
ऋ. १०.४७.७
तर्ज :- राकिली तन मली मरयुम
भक्ति भरे, दूत-भजन, भेजे तुझको भगवन्
स्तुति समूह के सुमत सुमन रख दिए तेरे चरनन
संदेश के रथ पर बैठे, ये दूत कर रहे प्रसरण,
दे दो चरणों में आयतन ॥
कृत और करिष्माण कर्मों के दूत बना दो ज्ञानी
धर्म युक्त मनमोहक धन से उन्हें बना दो नामी
प्रणत प्रार्थना प्रार्थी की सुन अपना बना लो भाजन
अतिशय भक्ति भाव संजोये, दूत कर रहे याचन ॥ भक्ति भरे…
आर्य बना के ‘इन्द्र’ को कर दो, परोपकार परायण
हृदयासन पर आके विराजो भाव भरित सुनो भजन
मनसा वाचा कर्मणा से प्रभु होवे बुद्धि उत्तम
अलख जगा दो हृदय में अपनी है, प्रभु अलख निरंजन ॥ भक्ति भरे…
स्तुति-समूह=अत्यधिक स्तुतियाँ, सुमत ज्ञानवान, बुद्धिमान, प्रसरण आगे बढ़ना, आयतन आश्रय,
सहारा, कृत किया हुआ, सम्पादित, करिष्माण करने के लिए उद्यत (तैयार), नामी प्रसिद्ध,
प्रणत-विनय युक्त, भाजन पात्र, याचन प्रार्थना, परायण प्रवृत्त, तत्पर, लगा हुआ, भाव भरित भावों
से भरे, अलख जगाना ईश्वर के नाम की भीख मांगना, इन्द्र आत्मा










