लचकीला शिष्य

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उपोषु जातमप्तुरं गोमिर्मङ्ग परिष्कृतम् ।

इन्दु देवा अयासिषुः ऋ ७.६१.१३ साम. ४१६, १६२

तर्जः काट्रिल मुड़ी उलियाउसया

अप्रतिम ! शिष्टजन आओ, बैठे संग

शालीन ! तुमसे यूँ विनय पाएँ हम

छोड़ें मद ईर्ष्या द्वेष और क्रोध
आए ना जीवन में अवरोध

होवे मन स्वभाव में मिठास
रहे मन में ईश्वर का वास

मिले आदेशों से ही प्रकाश
होंवे मनभाव विनीत भी साथ ॥
अप्रतिम ! शिष्टजन…

इस विनय के बिन विद्या भी रूखी रसहीन है
दूर है जीवन अमृत से, समझ लो वो दीन है

चरणों में शिष्ट जनों के, शिष्य तो विनीत हैं
बार-बार गुरु की सेवा में वो अनुनीत है

तृप्त नहीं होता फिर भी, करता वो कर्तव्य वर्धन

जी चाहता है उसका और भी करे कुछ अर्पण
त्यागता क्रोध द्वेष अभिमान और विनय बनता प्रेम-प्रमाण

सौम्यता का बनता प्रतिमान, मिलता जो भी देता प्रतिदान

अप्रतिम ! शिष्टजन…


है नहीं वो विद्या जो के, इस विनय से दूर है

संग जो शिष्टों का करते, उन सब में नूर है

उपदेशामृत से उनके शिष्य सुघ बनते हैं

उनके ही शिष्यों में भरती, कुलीनता प्रचूर है

सूखा काठ झुक नहीं सकता, लचक के अभाव से

यूँ. घमण्ड दूर ना होता, हठ के प्रभाव से

किन्तु जल में कोमलता है, हर पात्र में ढलता है

जीवन का नाम लचक है, घट में जो सरसता है

अप्रतिम अनुपम, अनोखा, शिष्टजन शिष्टाचार वाले लोग, शालीन अच्छे आचार-विचार वाला,

सभ्य, विनय नम्रता, अवरोध रूकावट, बाधा, विनीत विनम, लचक झुकाव, कोमलता, सरसना रस

में उमड़ना,प्रतिमान=समानताप्रतिबिम्बि,अनुनीत विनय प्राप्त प्रतिदान प्राप्त हुआ, सौम्यता सलता,

नूर प्रभा, चमक, सुघड़ कुशल, प्रवीण, प्रचूर अत्याधक ।