क्वेयथ क्वेदसि पुरुत्रा चिद्धि ते मनः
अलर्षि युध्म खजकृत पुरन्दर प्रगायत्रा अगासिषुः ॥
साम. २७१, ऋ ८.१०.१
तर्ज : सांझ भई अब आजा
देर भई धर आजा रे राजा (2)
दिन तो डूबा डूब ना जाए
आस का सूरज आजा रे ॥ देर भई…
राह रोकती है ना समझी जूझें हम किन किन से
राग द्वेष दम्भ लग गए पीछे पाप जुड़े तन मन से
मति भरमाई क्या बतलाएँ, तू ही ये बतला जा रे ॥ देर भई…
सुनना चाहूँ आहट तेरी दुर्दशा सुनेपन की
प्राण इन्दियाँ मन बुद्धि को, ढूँढ़े है तुझ साजन की
काँपती पलकें बाट निहारें (2) आ इस राष्ट्र के राजा रे ॥
देर भई…
इन असुरों को मार भगाओ लोहा लो चुन-चुन के
देह-राज्य का करो नियन्त्रण कष्ट व्यथा सुन सुन के
छोड़ ना जाना यूँ अन्जाना हे आत्मन् । करो वादारे ॥ ॥ देर भई…
यूँ तो हम आशावादी हैं और महत्वाकांक्षी
किन्तु तुम विन हम सुध विन हैं वात है विल्कुल साँची सु
न उद्बोधक गीत हमारे सुन सुन के अब आजा रे ॥ देर भई…
दम्भ घमंड, साजन प्यारा (आत्मा), आशावादी इच्छुक, महत्वाकांक्षी ऊँची अभिलाषा,
अन्जाना अपरिचित, सुधविन चेतना रहित, अचेतन, उद्योधक जागृत करने वाले










