अस्मभ्यम त्वा वसुविदमभिवाणी रनूषत ।
गोभिष्ट्रे वर्णमभितासयामसि ॥
साम. ५६५ ऋ.७.१०४.४
तर्जः चन्दा जा चन्दा जा रे जा रे
ला लाला ला ला ला…..
मनवा जा मनवा जा रे जा रे (2)
काहे आया है अकेला
कहाँ गायक है अलबेला
आ गवैए को भी संग ले के आ
मनवा जा…
आ तुझको पहचान बता दूँ तो वो लगता है कैसा?
सच्चे धन का देने वाला। वो प्रभु एक ही ऐसा !
ऐसे याज्ञिक को हृदय में बसा लूँ
खुद को यज्ञ का भागी बना लूँ
उसकी सारी विभूतियाँ हैं ज्योति प्रदा ॥
मनवा जा…
भाव भरे हैं तेरे ही रंग के, आ ‘प्रभु’ खेलें होली
रग रग में ऐसे बस जाए, बोलूँ तेरी बोली
धर्म पालूँ तो देना गवाही
प्रार्थना भक्ति स्तुति का हूँ राही
अमृत धर्म प्रचार का खूब पिला ॥
मनवा जा…
अलबेला=अनुपम, अनोखा, अनूठा, बेजोड़, छैला, सुन्दर, याज्ञिक यज्ञ करने वाला (ईश्वर),
विभूतियाँ=अलौकिक शक्तियाँ, प्रभुत्व, ज्योति प्रदा=ज्योति फैलाने वाली, ‘वसु’सच्चे धन धान्य
देनेवाला, गवाही साक्षी प्रमाण, गवैया गानेवाला, गायक










