दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन : फरीदाबाद

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डी ए वी शताब्दी महाविद्यालय फरीदाबाद के संस्कृत विभाग द्वारा ICSSR के सहयोग से आयोजित द्वि दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी – स्वामी दयानंद सरस्वती का वैदिक दर्शन (12–13 सितंबर 2025) (Hybrid Mode)
शोध सारांश भेजने की अंतिम तिथि-30-08-2025
शोध पत्र भेजने की अंतिम तिथि- 05-09-2025
संपर्क सूत्र- डॉ. अमित शर्मा- 9815974538
पंजीकरण लिंक – https://forms.gle/BUgrzNHNKDeabxEMA

कृपया इस लिंक को अपने अन्य ग्रुप्स में भी भेजने का कष्ट करें। इस अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में इतिहास, हिंदी, राजनीति शास्त्र विषय के प्रतिभागी भाग ले सकते हैं।

फरीदाबाद, हरियाणा (12-13 सितम्बर 2025)
डीएवी शताब्दी महाविद्यालय, फरीदाबाद के संस्कृत विभाग द्वारा भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR), नई दिल्ली के सहयोग से आयोजित “स्वामी दयानंद सरस्वती का वैदिक दर्शन” विषय पर केंद्रित द्विदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय (हाइब्रिड) संगोष्ठी का आयोजन 12 और 13 सितम्बर 2025 को किया जा रहा है। यह संगोष्ठी महाविद्यालय सभागार में भौतिक रूप से एवं ज़ूम ऐप पर ऑनलाइन माध्यम से आयोजित होगी।

महाविद्यालय का परिचय

डीएवी शताब्दी महाविद्यालय की स्थापना वर्ष 1985 में डीएवी प्रबंधक समिति, नई दिल्ली के तत्वाधान में की गई थी। महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक से सम्बद्ध यह संस्थान, UGC और NAAC से मान्यता प्राप्त है। लगभग 4500 छात्रों वाला यह महाविद्यालय शिक्षा के साथ संस्कारों का भी केंद्र है। यहाँ का संस्कृत विभाग विशेष रूप से भारतीय परंपरा, संस्कृति, वेद, दर्शन, साहित्य और धर्मशास्त्र के गहन अध्ययन द्वारा विद्यार्थियों के तार्किक एवं नैतिक विकास पर बल देता है।

संगोष्ठी की पृष्ठभूमि

आर्य समाज की 150वीं स्थापना वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित इस संगोष्ठी का उद्देश्य स्वामी दयानंद सरस्वती के बहुआयामी वैदिक दर्शन को समझना, उसकी प्रासंगिकता को वर्तमान संदर्भों में प्रस्तुत करना और आगामी पीढ़ियों के लिए इस धरोहर को संरक्षित करना है। स्वामी दयानंद भारतीय नवजागरण के अग्रदूत, समाज-सुधारक और वेदों के सच्चे प्रचारक थे। उन्होंने न केवल धार्मिक अंधविश्वासों पर प्रहार किया, बल्कि वेदों को ज्ञान और विज्ञान के मूल स्रोत के रूप में स्थापित किया।

संगोष्ठी का उद्देश्य

  • स्वामी दयानंद के वैदिक चिंतन की वर्तमान समय में उपयोगिता पर विमर्श
  • शोध पत्रों के माध्यम से उनके दार्शनिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, भाषाई एवं राष्ट्रीय दृष्टिकोण की विवेचना
  • संस्कृत भाषा और वेदों की आधुनिक संदर्भ में प्रासंगिकता को रेखांकित करना

प्रमुख विषयवस्तु

संगोष्ठी में शोधार्थी निम्नलिखित उपविषयों पर अपने शोधपत्र प्रस्तुत कर सकते हैं:

  • स्वामी दयानंद सरस्वती का राष्ट्रवाद एवं सामाजिक चिंतन
  • सत्यार्थ प्रकाश की वर्तमान प्रासंगिकता
  • वेद भाष्य, त्रैतवाद एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण
  • नारी सशक्तिकरण, शिक्षा दर्शन एवं वैदिक व्याकरण
  • स्वामी जी का आर्थिक चिंतन, राजनैतिक दृष्टिकोण एवं हिंदी भाषा में योगदान
    (अन्य संबंधित विषयों पर भी शोधपत्र आमंत्रित हैं)

प्रस्तुति और प्रकाशन

  • शोधपत्र हिंदी, संस्कृत या अंग्रेज़ी में प्रस्तुत किए जा सकते हैं।
  • चुनिंदा शोधपत्रों को महाविद्यालय की वार्षिक शोध पत्रिका “पैरिहंत” में प्रकाशित किया जाएगा।
  • सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र प्रदान किए जाएंगे।

संगठन संरचना

संरक्षकगण:

  • पद्मश्री डॉ. पूनम सूरी (अध्यक्ष, डीएवी कॉलेज प्रबंधक समिति)
  • प्रो. डॉ. एस.के. सोपोरी (उपाध्यक्ष, डीएवी कॉलेज प्रबंधक समिति)
  • श्री शिवरमन गौड़ (निदेशक, उच्चतर शिक्षा विभाग, डीएवी समिति)
  • डॉ. नरेंद्र कुमार (कार्यकारी प्राचार्य)

संयोजक:

  • डॉ. अमित शर्मा (विभागाध्यक्ष, संस्कृत विभाग)

आयोजन समिति:

  • डॉ. अर्चना सिंघल (पर्यवेक्षिका)
  • डॉ. जितेन्द्र दुल (आयोजन सचिव)
  • तकनीकी एवं कार्यकारिणी समिति में विभिन्न विभागों के अध्यापक शामिल हैं।

पंजीकरण विवरण

  • सामान्य प्रतिभागी: ₹750/-
  • शोध छात्र/विद्यार्थी: ₹500/-
    बैंक विवरण:
  • खाता नाम: Principal, DAV Centenary College, Faridabad
  • खाता संख्या: 0167010100000251
  • IFSC कोड: PUNB0486000

पंजीकरण लिंक:
https://forms.gle/BUGRznhnKDeABXEmA

व्हाट्सएप्प ग्रुप लिंक:
https://chat.whatsapp.com/GUZDgAAQTPciKMFLoSofME

संपर्क:
डॉ. अमित शर्मा – 9815974538
ईमेल: davccf.sanskrit@gmail.com
महाविद्यालय फोन: 0129-2415044


नोट:

  • ZOOM लिंक प्रतिभागियों को व्हाट्सएप्प ग्रुप पर भेजा जाएगा।
  • शोधपत्र की अंतिम तिथि, प्रारूप और निर्देश वेबसाइट एवं व्हाट्सएप्प ग्रुप पर समयानुसार साझा किए जाएंगे।

यह संगोष्ठी एक ऐसी बौद्धिक यात्रा है जो न केवल स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों को आधुनिक युग से जोड़ती है, बल्कि वैदिक ज्ञान परंपरा को शोधपरक दृष्टिकोण से जीवंत रखने का एक सार्थक प्रयास भी है।

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