शस्त्र प्रशिक्षण कार्यशाला संपन्न : गुरुकुल चोटीपुरा अमरोहा

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शास्त्र प्रशिक्षण कार्यशाला की सम्पूर्ति : विभिन्न विश्वविद्यालयों के 84 विद्यार्थियों ने किया प्रतिभाग

श्रीमद्दयानन्द कन्या गुरुकुल महाविद्यालय चोटीपुरा, अमरोहा में तीन सप्ताहों तक व्याकरण कार्यशाला का सफल संचालन किया गया । भारत सरकार की अष्टादशी परियोजना के अंतर्गत प्रारम्भ इस राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारम्भ 7 जुलाई को किया गया था। विगत 21 दिनों तक व्याकरण की शब्दसिद्धि प्रक्रिया को लेकर इस कार्यशाला का आयोजन किया गया और 28 जुलाई को सम्पूर्ति सत्र मनाया गया। इस सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में प्रो मधुकेश्वर भट्ट जी (केन्द्रिय योजना निदेशक, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली) एवं डॉ. शिवकुमार जी (प्राचार्य, गुरुकुल ततारपुर) व आचार्य कुशलदेव जी (गुरुकुल ततारपुर) के साथ-साथ अन्य अनेक अतिथि उपस्थित रहे। कार्यशाला में संस्कृत व्याकरण की अथाह विषयवस्तु को प्रस्तुत करने के लिए मुख्य वक्ता के रूप में पाणिनीय शोध संस्थान , बिलासपुर, छत्तीसगढ़ की अध्यक्षा माननीया डॉ. पुष्पा दीक्षित जी थीं, जो अपनी विशिष्ट शिक्षण पद्धति ‘पौष्पी प्रक्रिया’ के आविष्कार हेतु जानी जाती हैं। यही पौष्पी प्रक्रिया इस कार्यशाला का मुख्य पाठ्य विषय था।


28 जुलाई को मध्याह्न विभिन्न संस्थाओं से आए हुए विशिष्ट विशेषज्ञों की उपस्थिति में संपन्न सम्पूर्ति सत्र में छात्राओं द्वारा विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए। कुमारी श्रेष्ठा, आचार्य प्रथम वर्ष की छात्रा ने अपने भाषण में पौष्पी प्रक्रिया के महत्व को प्रस्तुत करते हुए कहा कि व्याकरण को सीखने की इससे ज्यादा सरल कोई परिपाटी नहीं हो सकती। तो राधिका शास्त्री द्वितीय वर्ष की छात्रा ने लुङ् लकार की कठिन प्रक्रिया को केवल 5 मिनट में ही प्रस्तुत कर दिखाया। आचार्य प्रथम वर्ष की ही छात्रा अदिति ने इस संपूर्ण सत्र के कक्षाओं के अनुभव को बड़े ही विनोदपूर्ण तरीके से सुना कर सभी को मुग्ध कर दिया। लखनऊ परिसर की छात्रा शिखा ने इस प्रकार की कक्षाओं से होने वाले लाभ और भविष्य में छात्रों को प्राप्त करने योग्य प्रेरणा को एक कविता के माध्यम से प्रस्तुत किया। साथ ही मीमांसा, सिद्धि, श्यामा और आकर्षिका ने भी बड़े ही जोशीले तरीके से अपने अनुभवों को बताते हुए सभी का धन्यवाद ज्ञापन किया।


डॉ. पुष्पा दीक्षित जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि धरती का नाम राष्ट्र नहीं है बल्कि वहां की संस्कृति का नाम राष्ट्र है। यदि देश को सुरक्षित रखना है तो शास्त्रों को सुरक्षित रखना होगा क्योंकि शास्त्र संरक्षण में ही देश की रक्षा है। उन्होंने कहा कि जो वेदादि शास्त्रों पर श्रद्धा रखते हैं और उनके लिए जीते हैं, वही हिंदू हैं। सरकार को विद्यालयों में पाठ्यनीति ऐसी बनानी चाहिए कि हमारा आने वाला युवा वर्ग अपने देश की संस्कृति, सभ्यता एवं संस्कारों से जुड़कर आत्मोन्नति करे। गुरुकुल की प्राचार्या डॉ. सुमेधा जी के संकल्प को नमन करते हुए उन्होंने कहा कि इनका जीवन एवं इनका कार्य इस संपूर्ण भारतीय समाज के लिए प्रेरणादायक है।


मुख्य अतिथि प्रो. मधुकेश्वर भट्ट जी ने कहा कि संस्कृत का व्याकरण संपूर्ण भारतीय वाङ्मय का बीज है। अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हुए वह बोले कि इस गुरुकुल को अपनी शिल्पबुद्धि व शास्त्र बुद्धि से सुंदर बनाने वाली प्राचार्या डॉ. सुमेधा जी के एवं व्याकरण शास्त्र को सरल बनाने वाली माता पुष्पा दीक्षित जी के सानिध्य में आकर आज मैं द्वैमातुर( दो माता वाला) बन गया हूं।


अंत में गुरुकुल की प्राचार्या डॉ. सुमेधा जी ने सभा में उपस्थित सभी महानुभावों का धन्यवाद ज्ञापन किया। उन्होंने कहा कि 83 वर्ष की आयु में माता पुष्पा दीक्षित जी की भारतीय संस्कृति और ऋषियों के शास्त्रों को संरक्षित करने की जो तड़प और लगन है वह बहुत ही प्रशंसनीय है। छात्राओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि इनका जीवन और इनकी कार्य क्षमता हर उस क्षण आपके लिए प्रेरणास्रोत बन सकती है जब आप कभी अपने कर्तव्य से विमुख होते हैं। गुरुकुल की शिक्षिका डॉ. सविता जी के द्वारा इस सभा का संचालन किया गया।

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