असावि सोमो अरुषो वृषा हरी। राजेव दस्मो अभिगा यचिक्रदत् ॥
पुनानो वारमत्येष्यक्यय छ। श्येनो न योनि धृतवन्तमासवत् ॥
साम. ५६२, १६१६, ऋ. ७.७२.१
तर्ज: यमुनायम सरयम पुरमी संगममू
अरुणिभा का आँचल, ओढ़ रहा धरणि तल
पत्ते हरित हुए रक्त सम, हर्षित हो रहा पक्षी दल
हल्की गुलाबी हुई बदरिया, श्वेत थी या वो श्यामल |
अरुणिमा…
बिछ गई जल पे लाल से चादर सी, हुई देख उषा को प्रकृति प्रसन्न
कौन सा ऐसा भावुक हृदय है, मुग्ध ना होगा देख के प्रबन्ध
तेज बरस रहा हितु हृदयहारी, कैसे मनहर स्नेहित पल ॥ अरूणिमा…
गोद में उषा की, लिया सूर्य ने जन्म, अरुण वर्ण से छाया ये दिग्दिगन्त
सूर्य-शिशु कह रहा है वाचाल होकर, उद्बुद्ध प्रजाओं का हुआ हूँ मैं सुम्न
रस पूर्ण भाषा में दिवस्पति ईश्वर कहते हैं सूर्यात्मा हूँ मैं प्रबल ॥
अरुणिमा…
हो रही रोमाञ्चित सारी ही सृष्टि वृक्ष पौधे तिनके घास हो रहे, प्रसन्न
प्रेम-प्रवाह निरन्तर बहता जगत में सूर्य चन्द्र तारे नियमों में बन्ध
चलती हवाएँ बहती हैं लहरें फैलती है तीर जैसी किरणें विमल ॥
अरूणिमा…
स्वास्थ्य सुख पाया किरणों की माया थाम लिया किरणों का सबने दामन
रवि की किरणों से छाई हरियाली जंगल में मंगल क्या होता है कम
वनस्पति औषधियाँ खिलते सुमन खड़े वृक्ष लहलहाते लाद फल ॥
अरुणिमा…
ये किस राजन का विस्तृत नियम है, इसमें आदित्य प्रभु के होते दर्शन
छाई अरुणाई उसके आदेश से चुपके-चुपके व्याप्त हुआ करता भरण
सारी शक्तियों को सम्य बना के करता है राजन विश्व मङ्गल ॥
अरुणिमा…
दिवस्पति=सूर्य, उद्युद्ध-चेतना युक्त, वाचाल=बोलने में चतुर, अरुणिमा=उपा, धरणीधरती,
सुम्न प्रसाद, बन्ध सम्पूर्ण, भरण पालन










