पवस्व मधुमत्तम इन्द्राय सोम क्रतुवित्तमो मदः महि द्युक्षतमो मदः ॥
साम. ५७८, ६१२
तर्ज : कुञ्जनेरम्, कुञ्जनेरम् कुञ्जपेत कोड़ादा
मन मेरे मस्ताना बन, छाए दीवानापन
अतितीव्र कर ले तू, कर्तव्य की भावना
डिगना नहीं पथिक तू, अपने कर्तव्य पथ से
कर्तव्य पालन का छा जाए तुझको नशा ॥ मन मेरे…
दुःख दर्द उठा कष्ट कर सहन, मेरे मन रसीले,
आत्मत्याग से पालन कर ले तू कर्तव्य अकेले
पहले तो धन का था लोभ, अब धन लुटाने का शौक
पहले तो यश का था जोश, अब सत्य हेतु लगी दौड़
अब हमारा तो परमेश्वर ही धन-धाम है सच्चा ॥ मन मेरे…
ईश्वर की दृष्टि में जो यश मिले सच्चा यश है वही
प्रभु ओर आत्मा का प्रस्थान सफलता है सही
मन जा तू ईश की ओर उसके बिना ना कोई ठोर
जव वाँधी प्रभु से डोर, मस्ती में झूमा मनमोर
इक मस्ती है, नित आनन्द है, बस बेखबर हो चला ॥ मन मेरे…
मेरे प्यारे मन मस्ताना तू वन प्रभु में ही खोजा
ये दीवानापन करता है मिलन आनन्द क्यों ना होगा
मस्ती कर्तव्य की लेले, सदाचार में क्यों ना खेले
मस्ती की बनाने मूरत प्रभु पहुँचा मुझसे पहले
आनन्दमय है रसमय तू, दोनों ही दे सदा ॥ मन मेरे…










