सुरीली झाँकी

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तर्ज: वार मुगिले मडयम

प्र. सोमदेववीतये सिन्धुर्न पिप्ये अर्णसा ।
अंशोः पयसा मदिरो न जागृविरच्छा कोशं मधुश्चतम्

साम. ५१४, ७६७, क्र.६.१०७.१२

प्यार मुझे तुमसे, चितचोर प्रभु मेरे ओ मेरे मित्र प्यारे, दर्श दे।
तरसीं आँखें तुझको झाँके
मधुर तान तेरी सुना दे, कान तरसें ॥ प्यार…

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मूर्ति हो सुरमय रस की, स्नेहस्वरूप तुम हो मेरे

हर रंग में दीखे तेरा रंग

हर लय आलाप में झूमे मन, झूमे हरख से ॥

वाह ! वाह! वाह ! वाह ! ॥ प्यार मुझे…

अंग अंग मेरा पुलकित, करे महत्ता तेरी स्वीकृत

मन भी आश्चर्य चकित हो, गाए महिमा के गीत

तेरी लीला न्यारी प्रियतम, अब नाच उठा मेरा मन

तेरे प्रणय में ॥ वाह! वाह! वाह ! वाह! प्यार…

तनू वनी-बारह दरी-सी, उसकी हर एक सी खिड़की

तेरे दर्शन की पिपासु, आँखें तरसी दर्शक की

मैं कहता हूँ प्रभु विनय से, तू वस जा प्रीतम हृदय के

इन नैनों में, वाह! वाह! वाह! वाह! ॥ प्यार…

मेघ बन वरसे चहुँ ओर, नाच उठा मन का मोर

नृत्य की सुन्दर थिरकन, देह वना नृत्य विनोद

हुई तृप्ति, मिल गया वर विशेष

सींचा हृदय मेरा हृदयेश, निजवारिद से। (पर्जन्य से)

वाह ! वाह! वाह! वाह! ॥ प्यार…

नाद था कितना मनोहर, प्रभु प्रथित ललित मोहन

धर्म ने शब्द का रूप, दे दिया, कर लिया धारण

उपदेश अनुत्तम जब सुना

उन्मेश हृदय का हुआ दूना, श्रुति श्रवण से ॥

वाह! वाह! वाह ! वाह ! ॥ प्यारा…

मैं तो चुप्पी साधे था, तुम केवल बोल रहे थे

तृप्त हुए कनरस कर्ण, नैनों के सम्मुख तुम थे

अन्धकार में सूर्य दिखाई दिया

विचित्र प्रभात समुदित हुआ तव दर्श से ॥

वाह! वाह ! वाह ! वाह ! ॥ प्यार…

दे रहा गान सुनाई, दर्श मिला नैन-भी हरखे

आँखों की पुतली में अब, सूर्य बनके तुम चमके

कहाँ जाऊँ-तुमको ढूँढ़ने

बसे नख शिख हृद अङ्ग अङ्ग में, सुर सुभग के

वाह! वाह ! वाह ! वाह ! ॥ प्यारा…