अकामो धीरो अमृतः स्वयम्भू रसेन तृप्तो न कुतश्चनो नः
तमेव विद्वान न विभाय मृत्युरात्मानं धीरमजरं युवानाम्
अथः १०/८/४४ ॥
तर्ज : कन्मानिक्कली इन्द कोटिले, कोनी उड़किले नीयो अन्वया
ज्ञानी मूर्ख पर मृत्यु का है डर, योग से आत्मा होता है अमर
कामनाअसर से है मृत्यु डर, उपासना प्रभु की नित्यकर
प्रभु प्रेरणा देते हर समय, ध्यान प्रेरणाओं पे धर ॥
ज्ञानी-मूर्ख पर…
ईश्वर प्यारा कामना रहित है, धीर अभय है और अमृत है
आनन्द-धन है ईश्वर, रस से वो तृप्त है
रस चूसता है आत्मा, रहता अतृप है
प्रभु के रस तो पा, साधक पाए प्रभा
ओ३म्-रस को पीके भक्त, पाता है आनन्द का असर ॥
ज्ञानी-मूर्ख पर…
माता शिशु को दूध पिलाती, इक स्तन से दूजे पर लाती
रोता अधीर बालक लालसा है मन में
जीवभोग हेतु लगा इस देह स्तन से
स्नेह से भरी जगदम्बा, एक देह से हटा के
दूजे देह में जनाती है सत्वर ॥
ज्ञानी-मूर्ख पर…
सुख सामग्री नाना तरह की, दे अनुभूति दुःख या भय की
मन में यदि भय हो, मिलता न आनन्द
तेरे उपासक तो रहते हैं सानन्द
न्यूनता नहीं, ईश में कभी
आत्मा जो कामना रहित है, उसे मृत्यु का नहीं है भय ॥
ज्ञानी-मूर्ख पर…










