आर्य क्यों सोया पड़ा खुद जाग तू जग को जगा
अपने संकल्पों से ऋषि दयानन्द के ऋण को चुका ॥ आर्य…
तुम तनिक सोचो असत्य से महर्षि कैसे लड़ा
कष्ट ने किए आक्रमण पर कष्ट को झुकना पड़ा
दे गए मधवन् ऋषिवर वेद ज्ञान की सम्पदा ॥ आर्य…
जागृति का सूर्य बनकर छा गया संसार पर,
वेद ज्ञान को कर उजागर चल दिया उपकार पर,
ऋषि के सत्यार्थ प्रकाश से सत्य की जागी प्रभा ॥ आर्य…
धर्म की खातिर वो जान से जान के अन्जान था ध्यान था
गुरु वचन का जिसमें निहित सन्मान था
आर्य शिष्य ऋषि के तुम दायित्व तुम पर है बड़ा ॥ आर्य…
लोग जागें, इससे पहले, तू ‘ललित’ खुद को जगा
कदम लाख चले ऋषि तू इक कदम चलके दिखा
प्राण बाती बुझे तो क्या, कुछ वेद दीप जला के जा ॥ आर्य…










