महिमाशाली तत्त्वदर्शी ऋषिजन हैं आत्मवेत्ता

0
8

महिमाशाली तत्त्वदर्शी ऋषिजन हैं आत्मवेत्ता

महिमाशाली तत्त्वदर्शी
ऋषिजन हैं आत्मवेत्ता
पाते हैं ईश्वर से शक्ति और प्रभा
महिमाशाली आत्मवेत्ता

ऋषियों ने जगाया
निज आत्मिक-मानसिक बल से
रहते हैं वह स्थितप्रज्ञ
ईश्वर के ही फल से
करते हैं पराभूत
वो असुरों को सदा
महिमाशाली तत्त्वदर्शी
ऋषिजन हैं आत्मवेत्ता
पाते हैं ईश्वर से शक्ति और प्रभा
महिमाशाली आत्मवेत्ता

काम, क्रोध आदि जब
आते हैं शत्रु सामने
सद्विचारों को जब ये
शत्रु लगते थामने
ऋषियों के सम्मुख
न चलती उनकी मया
महिमाशाली तत्त्वदर्शी
ऋषिजन हैं आत्मवेत्ता
पाते हैं ईश्वर से शक्ति और प्रभा
महिमाशाली आत्मवेत्ता

इन्द्र है वो आत्मा
पणियों को देता मात
ईश्वर है सहायक
कृपणता का करते घात
स्वार्थ की वृत्ति
ना कर सकती हमला
महिमाशाली तत्त्वदर्शी
ऋषिजन हैं आत्मवेत्ता
पाते हैं ईश्वर से शक्ति और प्रभा
महिमाशाली आत्मवेत्ता

यज्ञ-परायण परहित
से बने उदार-तेजस्वी
भाव अदान-तिरस्कृत
आ जाए ना मन में कभी
क्योंकि परमेश्वर
को रखते साथ सदा
महिमाशाली तत्त्वदर्शी
ऋषिजन हैं आत्मवेत्ता
पाते हैं ईश्वर से शक्ति और प्रभा
महिमाशाली आत्मवेत्ता

हम भी उस सहायक
की बाँह पकड़ लें आज ही
वृत्ति ना आने दें
कृपणता और पाप की
निष्पाप-निर्मल बनाते हमें सखा
महिमाशाली तत्त्वदर्शी
ऋषिजन हैं आत्मवेत्ता
पाते हैं ईश्वर से शक्ति और प्रभा
महिमाशाली आत्मवेत्ता

ओ३म् येन॒ ऋष॑यो ब॒लमद्यो॑तयन्यु॒जा येनासु॑राणा॒मयु॑वन्त मा॒याः।
येना॒ग्निना॑ प॒णीनिन्द्रो॑ जि॒गाय॒ स नो॑ मुञ्च॒त्वंह॑सः ॥
अथर्ववेद 4/23/5

रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई