रामाकृष्ण

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धर्म-प्रेमी रामाकृष्ण का जन्म लावसी ग्राम में अछूत कहे जानेवाले परिवार में हुआ था । धर्मवेदी पर प्रारणार्पण करने से दो सप्ताह पूर्व वे यज्ञोपवीत धारण कर आर्यसमाज में प्रविष्ट हुये थे ।

एक दिन पठानों ने ग्राम में घोषणा की कि हम मन्दिर तोड़ते हैं जो बहादुर हो, जिसमें धर्म का अभिमान हो, जिसे अपने बाहुओं पर विश्वास हो वह आकर मन्दिर को बचाले। सब हिन्दू भयभीत होकर अपने अपने घरों में बैठे रहे।

रामा ने भी घोषणा सुनी। इसका खून उबल उठा। पुजारियों ने कभी उसे मन्दिर के अहाते में प्रवेश नहीं करने दिया था। अब वह आर्यसमाजी था। उसके लिये मूति या मन्दिर की महिमा का कुछ प्रश्न न था । परन्तु उसने इस चुनौती को हिन्दू जाति की चुनौती समझा ।

जाति के मान की रक्षा के लिये वह निहत्था ही मन्दिर की रक्षा के लिये दौड़ पड़ा। उस पर गोलियों की वर्षा हुई। जख्मी होते हुए भी उसने पठानों को भगा दिया। मन्दिर की रक्षा हुई। जिस जाति में वह पैदा हुआ था उसकी नाक रह गई

उसे उस्मानाबाद के दवाखाने में पहुँचाया गया। वहां तीन चार दिन के बाद उसका आत्मा अनन्त आकाश में विहार करने के लिये इस शरीर पिञ्जर को छोड़ गया ।