जग जन के नायक दयानन्द हमारे

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जग जन के नायक दयानन्द हमारे

तर्ज: चले जा रहे हैं

जग जन के नायक दयानन्द हमारे
सदा ही रहेंगे ऋणी हम तुम्हारे ॥ जग जन के…

तुम्हारे बिना नारी होती बेचारी
इक इक करके गौरों कट जाती सारी
दलित दीन विधवाओं के कष्ट निवारे ॥ सदा ही…

न कष्टों की परवाह, ना मृत्यु का डर था,
न जुल्मों का शिकवा, ये सच का असर था
तपस्वी ऋषि सा मिलेगा कहाँ से? ॥ सदा ही…

टिके ना पाखण्डी ना धूर्त ना मूरख,
थे शास्त्रार्थ ऋषि के सत्य के पूरक,
वो ज्ञानी से चमके जैसे सितारे ॥ सदा ही…

जहाँ से मिले कष्ट, संयम से झेले,
अजय थे खिलाड़ी अकेले ही खेले,
खेल खेला ऐसा ना कोई खेला रे ॥ सदा ही…

जो वेदों की विद्या दी अमृतमयी थी,

ऋषि से पढ़ाई सुनाई गई थी,

प्रकाशित हुए नगर गलियाँ चौवारे ॥ सदा ही…

बहाई थी करूणा दिखाई दया थी,

विद्या सिखाई, अविद्या हटी थी
जन जाति धर्म में किए उजियारे ॥ सदा ही…

ज़हर के कहर से दयानन्द अभय था

क्षमा के लिए ऋषि का दिव्य हृदय था

इस लोक को बना परलोक सिधारे ॥ सदा ही…

जग से गए ऋषि दिल से ना जाएँ,
पल दिन सदियाँ युग वीतें चाहे,

स्वामी ऋषि योगी प्राणों से प्यारे ॥ सदा ही…