“वयं जयेम त्वया युजा”
(हे ईश्वर! आपके साथ जुड़कर हम विजय प्राप्त करें)
धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राण अर्पित करने वाले वीर सत्याग्रही श्री विष्णु भगवान् जी हैदराबाद राज्य के ताण्डूर कस्बे के निवासी थे। वे आर्य समाज द्वारा संचालित आर्य सत्याग्रह समिति के सक्रिय कार्यकर्ता थे। जब हैदराबाद रियासत में धर्म की स्वतंत्रता का दमन हो रहा था, तब उन्होंने अत्याचार के विरुद्ध आर्य सत्याग्रह में भाग लिया।
सत्य के पथ पर अडिग रहते हुए उन्होंने गुलबर्गा में सत्याग्रह किया, जहाँ से उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। गुलबर्गा से औरंगाबाद, और वहाँ से पुनः हैदराबाद जेल स्थानांतरित किया गया। हैदराबाद जेल में जहाँ अन्य सत्याग्रही भीषण कष्टों से गुजरे, वहीं श्री विष्णु भगवान् जी को अमानवीय यातनाएँ दी गईं।
नित्य अत्याचारों के बीच, उन्होंने अपने शरीर को सहनशीलता की पराकाष्ठा पर खड़ा किया। परन्तु अंततः ता० 2 मई 1939 को, उन पर की गई क्रूरताओं के फलस्वरूप जेल में ही उनका बलिदान हो गया। उस समय उनकी आयु मात्र 30 वर्ष थी।
उनका जीवन एक जाज्वल्यमान दीप की भाँति था, जिसने अंधकार में धर्म और स्वतंत्रता की ज्योति जलायी। श्री विष्णु भगवान् जी का यह बलिदान हमें यह सिखाता है कि जब धर्म पर संकट हो, तो एक आर्य पुरुष अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी अन्याय का प्रतिकार करता है।










