उस ईश्वर को क्यों तू भूला

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उस ईश्वर को क्यों तू भूला

उस ईश्वर को क्यों तू भूला
जिसने सुख भरपूर दिये

मोह माया में पड़कर मूरख
जीवन अपना व्यर्थ करे
राग द्वेष छल कपट ना तजकर
जीवन में अनर्थ करे
जो भी प्रभु की शरण में आया
समझो सब दु:ख दूर हुए
उस ईश्वर को क्यों तू भूला
जिसने सुख भरपूर दिये

जीवन धन तो प्रभु की अमानत
सोच के क्यूँ ना खर्च करे
पाप में सौदा घाटे का और
लाभ तो केवल पुण्य करे
पापी होते दण्ड के भागी
पुण्य सभी मंजूर हुए
उस ईश्वर को क्यों तू भूला
जिसने सुख भरपूर दिये

संचित कर ले शुभ कर्मों को
संगी साथी कर्म तेरे
छोड़ दे सब कुछ जगत् पिता पर
फल की क्यूँ तू आस करे
“ललित” तो है ईश्वर विश्वासी
मन के सब भ्रम दूर हुए
उस ईश्वर को क्यों तू भूला
जिसने सुख भरपूर दिये

रचनाकार :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
स्वर :- श्रीमती अदिति जी शेठ
शीर्षक :- उन आँखों में नींद कहाँ –
फिल्म :- मिनिस्टर – 1959

संचित = इकट्ठा करना, जमा करना
अमानत = जो वस्तु कुछ काल के लिए रख दी हो

पूरे भजन को ध्यान से सुनने से ऐसा लगता है जैसे
यजुर्वेद के अध्याय 2 के मन्त्र 23 का ही सार हो|

ओ३म् कस्त्वा॒ विमु॑ञ्चति॒ स त्वा॒ विमु॑ञ्चति॒
कस्मै॑ त्वा॒ विमु॑ञ्चति॒ तस्मै॑ त्वा॒ विमु॑ञ्चति ।

पोषा॑य॒ रक्ष॑सां भा॒गो॒ऽसि ।। २३ ।।
यजुर्वेद अध्याय 2/23

अर्थात्
जो मनुष्य ईश्वर के करने कराने वा
आज्ञा देने के योग्य व्यवहार को छोड़ता है
वह सब सुखों से हीन होकर और
दुष्ट मनुष्यों से पीड़ा पाता हुआ
सब प्रकार दु:खी रहता है | ……..
जो ईश्वर की आज्ञा को पालता है
वह सुखों से युक्त होने योग्य है
और जो कि छोड़ता है वह राक्षस हो जाता है |