अ॒ग्निं म॒न्द्रं पु॑रुप्रि॒यं शी॒रं पा॑व॒कशो॑चिषम् ।
हृ॒द्भिर्म॒न्द्रेभि॑रीमहे ॥
ऋग्वेद 8/43/31
अग्निरूप तेरा है प्यारा
मस्त करता मन हमारा
शुद्ध रूप ये ज्योतिकारक
नख से शिख तक करता पावक
रोम – रोम हृदय विदारक
है ये आनन्द का भण्डारा
मन्द्र हृदय क्यूँ सो रहा है
तू जगा अन्तःकरण को
मोर ज्यूँ मस्ती में नाचे
नाचे मन प्रभु प्रेम द्वारा
मन के वेगों में जगा ले
हार्दिक अनुभव प्रभु का
हो रोमांचित अन्तरात्मा
नयन बरसे अश्रुधारा
आओ मद्र अग्नि जलायें
लहर आनन्द की जगायें
प्यारे प्रभु को हम रिझायें
ईश को दें प्रेम सारा
अग्निरूप तेरा है प्यारा
मस्त करता मन हमारा
रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन
साहनी जी – मुम्बई
शीर्षक :- आओ उसे रिझायें भजन 52,
पुस्तक समर्पण
तर्ज :- प्रीत ही परशील तेव्हा मी तुला
विसरणार नाही
राग :- यमन










