प्रभु सृष्टियज्ञ को धारता
ओ३म् अ॒ग्निमी॑ळे पु॒रोहि॑तं य॒ज्ञस्य॑ दे॒वमृ॒त्विज॑म्। होता॑रं रत्न॒धात॑मम्॥१॥
ऋग्वेद 1/1/1
ओ३म् स न॑: पि॒तेव॑ सू॒नवे ऽग्ने॑ सूपाय॒नो भ॑व। सच॑स्वा नः स्व॒स्तये॑॥९॥
ऋग्वेद 1/1/9
प्रभु सृष्टियज्ञ को धारता,
वो पिता है पुत्रों को तारता
प्रभु सृष्टियज्ञ को धारता,
वो है नेता सृष्टि के यज्ञों का,
सृष्टि से पूर्व विद्यमान था
धारक विधाता वो यज्ञों का
और प्रकाशों का भी देवता
हर यज्ञ के ही आदि में,
उस स्तुत्य को मैं पुकारता
प्रभु सृष्टियज्ञ को धारता,
रमणीय ग्रह उपग्रह भरे,
ब्रह्माण्ड को धारण करे
सब रत्न इस ब्रह्माण्ड के
कल्याण हेतु ही धरे
ज्योति स्वरुप है वो प्रभु,
चहुँ ओर प्रकाश प्रसारता
प्रभु सृष्टियज्ञ को धारता,
सम्पूर्ण भोग्य पदार्थों के
दाता सदा से तुम रहे
पुत्रों को देते प्रसन्नता
और सुख समृद्धि दे रहे
हे प्रभु ! हमारे सूपायन:
सुख दो हमें हर प्रकार का
प्रभु सृष्टियज्ञ को धारता,
उपयुक्त पदार्थों को पाके हम
कल्याण को सब प्राप्त हों
णा दुरूपयोग हो सत्त्व का,
जो सत्त्व हो वो सुखार्थ हो
बन के पिता निज पुत्रों को
दुःख व्याधियों से उबारता
प्रभु सृष्टियज्ञ को धारता,
साभार :- समर्पण भाग-2,
(प्रार्थना-वैदिक वन्दना गीत),
रचनाकार :- श्री ललित सहानी जी – मुम्बई










