ऋषि दयानन्द ! ऋषि दयानन्द !

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ऋषि दयानन्द ! ऋषि दयानन्द !

ऋषि दयानन्द ! ऋषि दयानन्द !
गुरु दयानन्द ! जय दयानन्द !

भूली-भटकी मानवता को,
समझाए वैदिक मधुर छन्द
ऋषि दयानन्द ! ऋषि दयानन्द !
गुरु दयानन्द ! जय दयानन्द !

1) सच्चा शिव पाने जीवन वारा संसार जगाने –
विष पी गए सारा जब सत्य-धर्म का ज्ञान दिया
वेदों का ही गुणगान किया महिमा
यज्ञों की बतलाई पशुओं पर करुणा सिखलाई
हिंसा करवाई सकल बन्द
ऋषि दयानन्द ! ऋषि दयानन्द !
गुरु दयानन्द ! जय दयानन्द !

2) भारत का राज पद – तब पराधीन था
उस स्वर्णदेश का – जन दीन-हीन था
जब वैदिक धर्म की गूंजी जय
भागे भारत के सारे भय
लाला, बिस्मिल, आज़ाद, भगत
अनुगामी हुए – थर्राया जगत
गुरुदत्त, लेखराम, हंसराज
गुरुकुल-पथ आए श्रद्धानन्द
ऋषि दयानन्द ! ऋषि दयानन्द !
गुरु दयानन्द । जय दयानन्द !

3) नारी-समाज की – हर बेड़ी खोली
पाखण्ड, पाप की – घबरा गयी टोली
(सारी टोली, सारी टोली)
सच पर से परदे उठा
दिए आड़म्बर के मठ ढहा दिए
ईंट-पत्थर समवेत मिले
भर विष के प्याले भेंट मिले
ऋषि जीवन-ज्योति हुई मन्द
ऋषि दयानन्द ! ऋषि दयानन्द !
गुरु दयानन्द ! जय दयानन्द !

4) वैदिक निनाद का – स्वर मौन हुआ
ऋषि-सा महामानव – कब-कौन हुआ
गुरु का माँगा व्रत पूर्ण किया
कण-कण जीवन सम्पूर्ण दिया
युग-युग तक हम सब नत मस्तक धारें
जीवन प्रण वैदिक व्रत ‘कविता’
गुण लिख, पाए आनन्द
ऋषि दयानन्द ! ऋषि दयानन्द !
गुरु दयानन्द ! जय दयानन्द !