जीने को तो तू जी रहा विषयों में मन लगाए क्यूँ
मन तो तेरा भटक रहा मन को तू व्यर्थ सताए क्यूँ ? ॥ जीने को तो…
मुख से कहे कड़े वचन, बदले में ना हुए सहन
हमदर्द ना कभी हुआ, मन में दया न आए क्यूँ ॥ जीने को तो…
पापों से मन हटा नहीं, सत्कर्म में लगा नहीं
काँटों की राह पे ज़िन्दगी चोट पे चोट खाए क्यूँ ॥ जीने को तो…
आबाद खुद भी न हुआ, बरबाद औरों को किया
दुखियों को तू सताए क्यूँ लेता रहा तू हाय क्यूँ ॥ जीने को तो…
धर्म पे ना तेरा चलन ऋषियों का ना सुना कथन
बन्दे ये तेरी भूल है धरम से निजात पाए क्यूँ ॥ जीने को तो…
मन से हटा मद मोह को लोभ काम क्रोध को
बाकी जन्म सँवार के प्रभु की शरण न आए क्यूँ ॥ जीने को तो…
(निजात) = छुटकारा










