यज्ञ विधान गान प्रभु के हैं, आत्म त्याग प्रभु राग।
त्याग याग से प्रभु मिलते हैं, मिट जाते दुःख दाग।।
🏡 जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
श्री पुरुषोत्तम जी ज्ञानी का जन्म सन् 1867 ई. में बुरहानपुर (मध्यप्रदेश) में एक गुजराती औदीच्य ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता श्री जगद्याच जी ज्ञानी एक धर्मनिष्ठ और भजनोपासक पुरुष थे, जिनका समाज में विशेष सम्मान था। दुर्भाग्यवश बाल्यकाल में ही पुरुषोत्तम जी को पितृछत्र से वंचित होना पड़ा।
📚 शिक्षा और प्रारंभिक संघर्ष
पिता की मृत्यु के पश्चात्, ज्येष्ठ भ्राता ने मिडिल तक की शिक्षा घर पर ही दिलाई, परंतु आगे पढ़ने की इच्छा से श्री पुरुषोत्तम जी घर से निकलकर जबलपुर पहुँचे। वहाँ उन्होंने सेठ गोकुलदास के आश्रम में रहकर मंट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की और फिर बाटरवर्क्स में कार्य किया। दुर्भाग्यवश रोगग्रस्त हो जाने के कारण नौकरी छोड़नी पड़ी। इसके बाद तार का कार्य सीखा और अजमेर के रेलवे विभाग में तारबाबू नियुक्त हुए।
🕉 आर्यसमाज से जुड़ाव
आर्यसमाज की ओर झुकाव का बीजारोपण उस समय हुआ जब वे एक पंडित के संपर्क में आए, जिनके पास सत्यार्थ प्रकाश की प्रति थी। इस महान ग्रंथ के अध्ययन से उनके विचारों में वैदिक जागृति आई। सत्यार्थ प्रकाश ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी।
🚩 आर्यसमाज का प्रचार एवं संघर्ष
अजमेर में तारबाबू रहते हुए वे केतरगंज आर्यसमाज से जुड़े। संध्या करते समय उन्हें असामाजिक तत्वों द्वारा अपमानित किया गया, यहाँ तक कि शारीरिक आक्रमण भी सहने पड़े। परंतु वे अडिग रहे। सात वर्षों की सेवा के बाद डाक विभाग में स्थानांतरण हुआ जहाँ 25 वर्षों तक विभिन्न स्थानों पर रहते हुए वैदिक धर्म का प्रचार करते रहे।
🗣 समाज सुधार और निर्भीकता
अपने नगर बुरहानपुर में किसानों को व्यापारियों द्वारा शोषित होते देखा तो ‘फेंकी’ प्रथा के विरुद्ध आंदोलन किया। उन्होंने अछूतों के उत्थान के लिए भी भरसक प्रयास किए। शंकराचार्य डॉ. कुर्तकोटि को अछूतों की भेंट स्वीकार करने हेतु प्रेरित किया और वैदिक समरसता को स्थापित किया।
⚔ हैदराबाद सत्याग्रह – वीर वृद्ध की अमर गाथा
1939 में हैदराबाद (निजाम) के विरुद्ध आर्य सत्याग्रह के दौरान मध्यप्रान्त से प्रथम सत्याग्रही बनने का सौभाग्य इन्हें प्राप्त हुआ। उन्होंने गुलबर्गा में सत्याग्रह किया, जेल गए, संग्रहणी रोग से ग्रस्त हुए फिर भी घर लौटने से इनकार किया। बाद में पुनः गिरफ्तार हुए परंतु वृद्धावस्था के कारण छोड़े गए। उन्होंने ओ३म् का झण्डा लेकर प्रचार जारी रखा।
🔚 अन्तिम बलिदान
अंततः 26 अगस्त 1939 को श्रावण कृष्ण द्वादशी के दिन उन्होंने आर्यधर्म की बलिवेदी पर अपने प्राण अर्पण किए। अंतिम समय में जब उन्होंने अपने सत्याग्रही पुत्र पं. रामदत्त जी को चंचलगुड़ा जेल से छूटकर सामने पाया, उनकी आँखों में विजय की संतुष्टि और ओठों पर मुस्कान थी। 72 वर्ष की आयु में उन्होंने परमात्मा के ओ३म् नाम का जाप करते हुए शरीर का परित्याग किया।
👨👩👧👦 परिवार
उनकी धर्मपत्नी, चार पुत्र, बहुएं, पोते-पोतियाँ आज भी उनके त्याग और धर्मनिष्ठ जीवन के प्रमाण हैं।
🕯 स्मृति में
श्री पुरुषोत्तम जी ज्ञानी आर्यसमाज के उन अमर सेनानियों में हैं, जिनका जीवन वैदिक धर्म, निर्भीक प्रचार, सामाजिक सुधार और राष्ट्रसेवा का प्रेरक इतिहास है। उन्होंने दिखाया कि सेवा, सत्य और साहस से जीवन को महापुरुषत्व में रूपांतरित किया जा सकता है।










