मगन मन मोरा, प्रभु गीत गाए

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मगन मन मोरा, प्रभु गीत गाए

तर्ज: सजन संग काहे नेहा लगाए

मगन मन मोरा, प्रभु गीत गाए
सुर को सजाए । मगन मन…

भोर गई के रैना पक्षीगण गाएँ महिमा
तरुबाँही शीश झुकाए नदिया भी चाहे बहना….हो जी हो
धरती संग गाए बरखा पर्वत संग पवन ॥ मगन मन…

सागर से व्योम मण्डल तक नादब्रह्म का है गुञ्जन
योगी ऋषि मुनि हैं पाते दिव्यरूप तेरा दर्शन…. हो जी हो
जल,वायु, अग्नि, पृथ्वी गाए दूरगगन ॥ मगन मन…

मंगलमय प्रेम स्वरों से जागे मेरा अन्तर्मन
शाश्वत स्वरों की मधुमय पाऊँ हृदय में कम्पन….हो जी हो
नित तेरा करता रहूँ मैं चिन्तन और मनन ॥ मगन मन…

(तरुवाँही) वृक्ष की शाखाएँ या डाल (शाश्वत) नित्य, स्थाई (नादनहा) ब्रह्मस्वरूप घोष (व्योममण्डल)
आकाश का घेरा