“मैं सुमन सहस हँस-हँस कर, जग को भी साथ हँसाऊं।
सौरभ समीर सा लेकर मैं, फैल विश्व में जाऊं।।”
🏡 जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
वीरवर बदनसिंह का जन्म जुलाई 1921 ई. में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के मुजफ्फराबाद ग्राम में हुआ। आपकी माता का नाम श्रीमती हीरा देवी और पिता का नाम ठा. टीकासिंह था।पितामह गाँव के प्रतिष्ठित जमींदार थे लेकिन उन्हें नशे की लत ने धीरे-धीरे परिवार को आर्थिक और सामाजिक रूप से बर्बाद कर दिया। फिर भी उनका घराना क्षेत्र में “अधिकारी” नाम से जाना जाता रहा।
👩👦 माता-पिता और प्रारम्भिक शिक्षा
बदनसिंह की माता सादगी और सदाचार की सजीव मूर्ति थीं, किन्तु दुर्भाग्यवश बाल्यकाल में ही उनका निधन हो गया। उनका लालन-पालन पिता ने स्वयं किया और वे इकलौते पुत्र के रूप में सदैव उनके साथ रहते थे।छः वर्ष की आयु में उन्हें सरकारी विद्यालय में भेजा गया, जहाँ वे मेधावी, विनम्र और सहृदय छात्र के रूप में प्रसिद्ध हुए। न तो उनमें जातीय अहंकार था, न ही कठोरता – वे सच्चे राजपूत होते हुए भी सहनशील और सौम्य स्वभाव के थे।
📘 वैदिक प्रभाव और चरित्र निर्माण
जब वे दस वर्ष के हुए, उनके गाँव के स्कूल में मास्टर शेरसिंह नामक शिक्षक का आगमन हुआ। वे आर्यसमाज के कट्टर अनुयायी थे। उन्होंने शिक्षा के साथ-साथ वैदिक विचारों का प्रचार भी आरम्भ किया।बदनसिंह पर उनका गहरा प्रभाव पड़ा और वे मूर्ति-पूजक परिवेश से निकलकर वैदिक धर्म की ओर प्रवृत्त हो गए। उनके सद्गुणों में गुरु का यह योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा।
🏹 हैदराबाद सत्याग्रह में भाग
1939 में हैदराबाद राज्य की जनता पर अत्याचार की काली घटाएँ मंडरा रही थीं। आर्यसमाज ने जब सत्याग्रह का आह्वान किया, तो बदनसिंह ने उसमें भाग लेने का निश्चय किया।उस समय उनके पिता बीमार थे, फिर भी उन्होंने धर्मयुद्ध में अपने इकलौते पुत्र को सहर्ष विदा किया। गाँव की माताओं ने उन्हें विजयी आशीर्वाद दिया और लोग फूलमालाओं से स्वागत कर उन्हें धर्मक्षेत्र में भेजने आए।
✊ बलिदान की अमर गाथा
17 जून 1939 को बदनसिंह ने वेजबाड़ा में सत्याग्रह किया। उन्हें गिरफ्तार करके वारंगल जेल भेजा गया, जहाँ वे आंत्रज्वर से पीड़ित हो गए।स्वास्थ्य बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल ले जाया गया, परंतु दुर्भाग्य से 24 अगस्त 1939 को उन्होंने सत्य के लिए अपने प्राण त्याग दिए। उस समय उनकी उम्र मात्र 18 वर्ष थी।एक मास पश्चात उनके पिता भी इस संसार से विदा हो गए – जैसे अपने अमर पुत्र से मिलने चले हों।
📜 प्रेरणादायी सन्देश
बदनसिंह का जीवन उस वीर संन्यासी की कहानी है जिसने धर्म के लिए सब कुछ त्याग दिया – न वह पीछे हटा, न डरा, और न ही कभी भ्रमित हुआ। उन्होंने दिखा दिया कि वीरता उम्र नहीं, चरित्र मांगती है।










