भक्त अरुड़ामल जी

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🕊 जीवन परिचय एवं प्रारंभिक सेवाएं

श्री अरुड़ामल जी सरगोधा (अब पाकिस्तान में) के निवासी थे। वे खादी पहनने वाले, अत्यंत सादगीपूर्ण जीवन जीने वाले, सेवा-भाव के प्रतीक और आर्यसमाज के सच्चे अनुयायी थे।
वे एक अंग्रेजी फर्म लूसडाइफस कम्पनी में चपरासी थे, परंतु उनके विचारों में गहरी क्रांति तब आई जब सन् 1910 में कुबर सुखलाल का देशभक्ति से ओतप्रोत भजन उन्होंने सुना।


🪔 देशभक्ति की ओर अग्रसर

उस भजन ने उनके हृदय में क्रांति का दीप प्रज्वलित कर दिया और उन्होंने नौकरी छोड़ दी।उन्होंने खादी का झण्डा कंधे पर लेकर नगर-नगर घूमकर स्वदेशी वस्त्रों और खादी के प्रचार में जीवन समर्पित कर दिया।


✊ राजनीतिक चेतना एवं जेल यात्राएं

पं. ज्ञानचंद्र जी के मार्गदर्शन में उन्होंने शराब विरोधी आंदोलन (पिकेटिंग) में भाग लिया और तीन बार जेल गए।रोज़ी-रोटी के लिए वे मुनादी करते थे, लेकिन सेवा की हर पुकार पर वे सदा हाज़िर रहते थे – चाहे वह हिन्दू हो, मुसलमान या सिख।


🔱 आर्यसमाज प्रेम और हैदराबाद सत्याग्रह

आर्यसमाज के प्रति उनकी अगाध निष्ठा उन्हें हैदराबाद सत्याग्रह तक ले गई।22 मार्च को उन्होंने श्री खुशहालचन्द जी के साथ गुलबर्गा में सत्याग्रह किया और जेल गए।वहीं जेल में रुग्ण हो गए। असुपाल (हॉस्पिटल) में उन्होंने “वैदिक धर्म की जय” के उद्घोष के साथ अपने धर्मप्रेम की अंतिम आहुति दी। जबरन रिहा कर दिए गए, परंतु वे कहते थे:मैं धर्म की वेदि पर अपने प्राणों की भेंट देना चाहता हूँ। पर पता नहीं ईश्वर मेरी भेंट क्यों स्वीकार नहीं करता।”


🕯 अंतिम क्षण और सम्मानजनक विदाई

1 अगस्त 1939 को लाहौर में उनके प्राणों का अवसान हो गया।उनका शव लाहौर से सरगोधा लाया गया, जहाँ बड़ा ऐतिहासिक जुलूस निकला – सभी सम्प्रदायों ने भाग लिया।
संपूर्ण बाजार बन्द रहा और वैदिक विधि से अन्त्येष्टि की गई। यह सरगोधा में प्रथम और विशिष्ट घटना थी।


🌟 उनकी प्रेरणा

अरुड़ामल जी का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति केवल उपासना नहीं, अपितु कर्म है – समाज के लिए, राष्ट्र के लिए, और धर्म के लिए।
वे एक ऐसे “भक्त योद्धा” थे जिनके लिए सेवा ही साधना थी।