सूना क्यूँ मन का मन्दिर हुआ
तर्ज : सूना है मेरे दिल का जहाँ
न कर्म किया न धर्म, जिन्दगी यूँ व्यर्थ गई
दिया बुझा ही रहा रोशनी न हुई ॥
सूना क्यूँ मन का मन्दिर हुआ
ना मन में प्रभु का दीप जला
दीदार प्रभु का क्यूँ ना हुआ (2) ॥ सूना क्यूँ…
प्रभु से बिछड़ कर ये जिन्दगी
पतझड़ के जैसे बेमौसमी
अपना पता ना तुझको रहा
हस्ती रही ना कोई निशाँ (2) ॥ सूना क्यूँ…
सत्कर्म से क्यूँ तू दूर है
दुष्कर्म से क्यूँ मजबूर है
स्वार्थ में जीवनभर डूबा हुआ
अपने विनाश का कारण बना (2) ॥ सूना क्यूँ…
जिस दिल में प्रभु का दीदार था
दर्शन का तुझको भी अधिकार था
रहबर था राह थी क्यूँ ना गया
बेरंग जीवन से क्या है मिला? (2) ॥ सूना क्यूँ…
आजा तू बन्दे प्रभु की शरण
कर पश्चताप न छोड़ चरण
माँग क्षमा वो दयालु बड़ा
देगा वही तुझको सही रास्ता (2) ॥ सूना क्यूँ…
(दीदार) दर्शन (पश्चाताप) पछतावा










