कितने महान ऋषिवर, तुझको ना जान पाए

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कितने महान ऋषिवर, तुझको ना जान पाए

तर्ज : मैं नजर से पी रहा हूँ

कितने महान ऋषिवर, तुझको ना जान पाए
तुम दे गए थे अमृत, हमने जहर पिलाए ।
मानव के हित की खातिर, वैभव तमाम छोड़े
मारे जिन्होंने पत्थर, उन पर रतन लुटाए ॥ तुम दे गए थे…

मानव के हित की खातिर, वैभव तमाम छोड़े
मारे जिन्होंने पत्थर, उन पर रतन लुटाए ॥ तुम दे गए थे…

तप त्याग और संयम, थे अब ऋषि को प्यारे
काँटो की चोट खाके, ऋषि फूल चुन के लाए ॥ तुम दे गए थे…

भटके हुए थे इन्साँ, बँटते दिए दिखाई
उनके लिए दयानन्द, बन रहनुमा थे आए ॥ तुम दे गए थे…

जिनके दिलों को रोशन, तुम कर रहे थे हरदम
हँसे प्राण लेके पहले, फिर रोए पछताए ॥ तुम दे गए थे…