“यस्य जना न वदन्ति महत्त्वं नो समरे मरणं विजयं वा।
न श्रुतदानमहाधनतां वा तस्य भवः कृमिकीटसमानः।।”
जिसका न जीवन कोई मूल्य जाने, न मृत्यु का कोई गौरव हो—वह जीवन कीड़ा-मकौड़े समान है। लेकिन ब्रह्मचारी दयानन्द का जीवन और मृत्यु दोनों ही गौरवशाली इतिहास के पृष्ठों में स्वर्णाक्षरों से अंकित हैं।
🏡 जन्म व बाल्यकाल
सन् 1919 के पौष मास में उत्तर प्रदेश के हरदोई ज़िले के सुरसा ग्राम में जन्मे दयानन्द, पं० रघुनन्दन शर्मा और श्रीमती सहोदरा देवी के ज्येष्ठ पुत्र थे। पाँच संतानों में सबसे बड़े दयानन्द, माँ के अत्यंत लाडले थे। उनका जन्म उसी कक्ष में हुआ था जहाँ महर्षि दयानन्द का चित्र टंगा था—शायद इसीलिए उनके जीवन में भी वही तेज, वही तप, और वही त्याग था।
📖 शिक्षा यात्रा
छह वर्ष की आयु में गाँव की पाठशाला से शिक्षा का आरंभ हुआ। संस्कृत की शिक्षा के लिए घर पर ही अध्ययन कर प्रथमा परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद गुरुकुल महाविद्यालय, ज्वालापुर में चार वर्षों तक शिक्षा प्राप्त कर मध्यमा परीक्षा पास की। तत्पश्चात न्यायशास्त्र की शिक्षा हेतु काशी के नित्यानन्द वेद विद्यालय भेजे गए।
💔 माँ का वियोग और जीवन में मोड़
इसी बीच उनकी जननी का देहांत हो गया। इस वियोग के समय वे ग्राम लौटे, किंतु जल्द ही गर्मी की छुट्टियों में ज्वालापुर चले गए। यहीं से उनके जीवन का एक नया अध्याय प्रारम्भ हुआ।
✊ हैदराबाद सत्याग्रह में भागीदारी
सन् 1936, हैदराबाद सत्याग्रह का आह्वान हुआ। युवा दयानन्द ने भी इसमें भाग लेने का निश्चय किया। पिताजी की सहमति और मित्रों के परामर्श से वे ब्रह्मचारी आनन्दप्रकाश के नेतृत्व में तीसरे जत्थे के साथ हैदराबाद पहुंचे और सत्याग्रह किया। उन्हें 2 वर्ष का कठोर कारावास मिला।
🏛 कारावास और स्वास्थ का संकट
जेल में उनका साहसी और अन्याय-विरोधी स्वभाव अधिकारियों को खटकने लगा। उन्होंने हर गलत कार्य का विरोध किया, जिससे व्यवहार और कठोर होता गया। परिणामस्वरूप उनका स्वास्थ्य गिरता गया। दस्त की भयंकर बीमारी उन्हें लग गई।
🏠 वापसी और अंतिम क्षण
समझौते के बाद वे मुक्त होकर हरदोई लौटे। लेकिन अब शरीर जर्जर हो चुका था। समस्त उपचारों के बावजूद 9 मार्च 1940 को प्रातः उनका देहावसान हो गया। समाचार बिजली की भांति हर ओर फैल गया। पूरे नगर ने अश्रुपूरित नेत्रों से उन्हें अंतिम विदाई दी।
🔥 साहस और तेजस्विता की मिसाल
उनका जीवन साहस, आत्मसम्मान और अन्याय-विरोध की मूर्ति था। बनारस दंगे में उनका हिन्दुओं के पक्ष में खड़ा होना और एक घरेलू संघर्ष में 16 वर्ष की अवस्था में चाचा पर हमला करने वाले को दण्ड देना—ये सब उनकी क्रांतिकारी मनोदशा का परिचायक हैं।










