आजादी का भारतवासी उल्टा अर्थ लगा बैठे
आजादी का भारतवासी उल्टा
अर्थ लगा बैठे देश भक्ति और
त्याग तपस्या कोसों दूर भगा बैठे
जो छिप-छिप कर करते थे,
वह पाप आज सरे आम करे
अपना जीवन नष्ट करे हैं,
भारत को बदनाम करे दोष
बतायें औरों का खुद उल्टे टेढे
काम करे रग-रग में छल कपट,
बगल में छुरी धुन मुख से राम करे
काम क्रोध मद लोभ मोह को,
हृदय बीच जगा बैठे।।1।।
कुछ लोगों ने ध्वनि लगाई,
मांग रहा है हिन्दुस्तान पेट को
रोटी तन को कपड़ा,
और रहने के लिये मकान
कुछ बुगले भक्तों का भोली,
जनता को ठगने का ध्यान
देश भक्ति का तमगा लगकर,
जोश में आकर दें व्याख्यान
आज कुछ मानव मानवता को,
देकर दम्भ दगा बैठे।।2।।
जगह-जगह बाजर गर्म है
स्वार्थ की बिमारी का
कर्तव्य पालन भूल गये
ढंग बिगड़ा जनता सारी का
दया धर्म सत्य न्याय गया,
कट्टर दिल हर नर नारी का
चारो और यूं शोर मचा है
भारत में बेकारी का आलस्य और
प्रमाद में पड़कर पारसमणि ठगा बैठे।।3।।
चाहिये था कि द्वेष मिटा कर
प्रेम की गंग बहा देते
जाति पाति और ऊंच नीच की
बीच से भीत हटा देते
देश अपना देश समझ कर
देश को स्वर्ग बना देते
शोभाराम भूले बिसरों को,
सीधी राह दिखा देते ओरों को
क्या अपनायेंगे जो अपनों को भगा बैठे।।4।।










