धीरे धीरे देश का यह कैसा रंग हो गया
धीरे धीरे देश का यह
कैसा रंग हो गया
बच्चा बच्चा देश कर
हर चीज से तंग हो गया
पहले तो हम कैसे थे
अब हाल क्या हमारा है
घी और दूध गये
सूखी रोटी पर गुजारा है
निहारा है कुछ दिन से
तो उसमें भी भंग हो गया।।1।।
जिस जगह था त्याग
आज लोभ भरपूर है
देश का हर व्यक्ति
आज खुदगर्जी में चूर है
दूर है किनारा नाव
डुब्बन का ढंग हो गया।।2।।
अत्याचार दीख रहा
बढ़ता चारों ओर है
विद्वता विहीन धूर्त
पाखंडियों का जोर है
गौर है न धर्म और
पाप का जंग हो गया।।3।।
शोभाराम प्रेमी कहे
वीरो आलस छोड़कर
वर्ण व्यवस्था कायम करो
जाति-पाति तोड़कर
दौड़कर मिला लो अपना
न्यारा जो अंग हो गया।।4।।










