ऋषि दयानन्द के दीवानो तारीखे समझो तो।

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ऋषि दयानन्द के दीवानो तारीखे समझो तो।

ऋषि दयानन्द के दीवानो
तारीखे समझो तो।
बलिदान सरों के दे बैठे हैं
आजादी की कीमत समझो तो॥
खामोश जुबां लहू देकर के
सींचा था ये उजड़ा चमन कभी।
बन्द होके रहे जिन्दानों में
चूमा था वो दारोरसन कभी॥
जंजीर गुलामी की तोड़ी जब
पाई ये नेमत समझो तो॥1॥

भूखे भी रहे दो घूंट नहीं
पानी भी मिला पीने के लिये।
हक मांगा फिरंगी से अपना
गोली ही मिली सीने के लिये॥
लाशों को कफन भी मिल ना सका
वो दौरे मुसीबत समझो तो ॥2॥

गाते थे कभी वीरानों में जालिम
तू हमें बर्बाद न कर।
हकदार हैं हम आजादी के
ए जुल्मो सितम नाशाद न कर॥
जाँ दे दी तराने गा-गाकर थी
वतन से उल्फत समझो तो ॥3॥

हर मार सितम की सह करके
बदनामी ये सर पर ले बैठे।
सामन्ती जो भूखे थे जर के
उन्हें मुल्क की सत्ता दे बैठे॥
कर्मठ है विदेशी सोनिया की
जमीं हिन्द पै नीयत समझो तो॥4॥