जा मन प्रभु शरण में प्रभु प्रेम स्नेह पाले
तर्ज : जा आपल्या घरी तू जा लाडके सुखा ने
जा मन प्रभु शरण में प्रभु प्रेम स्नेह पाले
प्रभु में हैं गुण अनेकों संग करके मन सजाले ॥
बनजा प्रभु का प्रार्थी, वाणी में स्तोम् भाषा
समिधान हो स्वयं तू बन जा प्रभु का ध्याता
प्रभु के सदृश्य मन से गुण कर्म उपजाले ॥ जा मन प्रभु शरण में ॥
तू दिव्य कर्म में ही यतमान होके रहना
करे प्रार्थना तू जैसी सत्कर्म वैसा करना
तू प्रकाशमान हो निज अन्तःकरण जगाले ॥ जा मन प्रभु शरण में ॥
पुरुषार्थ प्रार्थना से बनते प्रभु सहयोगी
गुण कर्म ना सधै तो केवल बने तू भोगी
यशगान से है बेहतर यश कर्म तू कमा ले ॥ जा मन प्रभु शरण में ॥
अगणित तेरे पराक्रम हे प्रभु ! पूजित धनवाले
भक्तोंको बल दे भगवन् सर्वज्ञ हे बलवाले
दुष्कर्म से हटा मन सत्कर्म में लगा दे ॥
(स्तोम) स्तुति समूह (यतमान) संलग्न, प्रयत्नशील (समिधान) प्रकाशित (प्रार्थी) प्रार्थना करनेवाला










