हे प्रभु जीवन हमारा अग्निरूप महान कर दो
दृढ़ करो संकल्प हमारे प्रेरणा स्वःस्वरूप भर दो ॥
यज्ञ के यजमान बनकर हम प्रभु उर्ध्वगामी
खुद को उन्नत करके हम औरों को उन्नत कर दें स्वामी
छोड़ें ई-द्वेष प्रभुजी मन और चित्त को निर्मल कर दो ॥
दीप विद्युत सूर्यचन्द्र हो या हो ग्रह नक्षत्र तारे
अग्नि का गुण है स्वाभाविक तम हो नाश प्रकाश उबारे
भिन्न रूप प्रकाश से प्रभु मन व चित्त को उज्जवल कर दो !!
इक चिन्गारी से भी बन सकती है अग्नि दावानल
अग्नि की विस्तार सीमा बाँध सका ना गगन ना तल
बीजरूप चिन्गारी से महावृक्ष सा जीवन यूँ कर दो ॥
सृष्टि के पच्च तत्वों में अग्नि का है तेज तमोभिद्
सूर्य में भी हो रही है उष्णता और तेज मुखरित
तेजोमय दिव्य रूप तेरा हमको भी तेजस्वी कर दो ॥
आत्मसात करती है अग्नि भस्मसात करने से पहले
उड़के दूर सुदूर गगन से ब्रह्मलीक तक जाके फैले
दूर तक सद्गुण जो फैले ऐसा गुणग्राही तो कर दी ॥
भरमशील ये शक्तियाँ जब जब जगत में क्षीण हुई
हो गई जर्जरा धरा दुःख और सन्ताप से दीन हुई
ना पतन हो ज्ञान और कर्मेन्द्रियों में शक्ति भर दो ॥
द्विक पदार्थी के संघर्ष से अग्नि उद्दीप्त हो जाती है
जीवन के संघर्षों से दुलर्भ वस्तुएँ मिल जाती हैं
चित्त में हो चन्दन सी गन्ध मन में चमक कुन्दन सी कर दो ॥
परोपकार धर्म अग्नि का जो सुख समृद्धि देती सबको
तपना होगा समिधा बनकर जीवन के यज्ञ कुण्ड में तुमको
अमृत पथ के यजमानों को अग्निपथ पर अग्रसर कर दो ॥
(स्वःस्वरूप) प्रकाश स्वरूप (यजमान) याजक, यज्ञवेदी पर बैठा मुख्य व्यक्ति (दावानल) भीषण
आग (तमोभिद) अन्धकार दूर करनेवाला (आत्मसात) अपने अधिकार में (भस्मशील) जलाकरराख कर
देना (क्षीण) दुर्बल, कमजोर (दिक) द्वय,दो (उद्दीप्त) प्रकाशित (समिधा) अग्नि में डालनेवाली लकड़ी










