स्वतन्त्रता अभिशाप सी लगती समझे थे वरदान है।

0
9

स्वतन्त्रता अभिशाप सी लगती समझे थे वरदान है।

स्वतन्त्रता अभिशाप सी
लगती समझे थे वरदान है।
फिर भी हृदय रोकर कहता
मेरा भारत देश महान है॥ टेक ॥
मुक्त गुलामी से होने को
कितने ही प्रयत्न किये।
इतिहास के पृष्ठ बतादेंगे यह,
भेंट में कितने रत्न दिये ॥


कारावास मृत्यु दण्ड तक
और कितने ही बेवतन किये।
जलियां वाले काण्ड पै लन्दन
में अंग्रेज ने जश्न किये ॥
प्रतिशोध चुकाने की खातिर
पहुंचा उधम बलवान है॥1॥

देशभक्त रोते हैं याद
करके बलिदान शहीदों के।
हिंसा कपट की नीति से
बुझ गये चिराग उम्मीदों के॥
अपहरण और हत्याओं से
दिल हिलते नहीं दरिन्दों के।
देख चमन वीरान अश्क
आँखों में भरा परीन्दों के॥
तप करुणा की शुभ सौरभ का
उजड़ा यह उद्यान है।॥2॥

देश के रहबर अपने लिए
औरों के ठुकरा सुख बैठे।
सैकुलरिजम के नारे से
घृणा वेदना देकर दुःख बैठे॥
देश से पहले मजहब पन्थों
को समझे प्रमुख बैठे।
जीवन से हैं दूर मौत की
ओर किये अब रुख बैठे॥
इसी लिए तो विस्फोटों से
जल रहा हिन्दुस्तान है।॥3॥

अपनी सुरक्षा के ऊपर तो
करोड़ों का व्यय धन होता।
की रक्षा को नहीं कभी
भी चिन्तित मन होता॥
मगर राष्ट्र चन्द्रगुप्त चाणक्य की
भांति जो कुछ भी अपनापन होता।
क्यों कश्मीर की वादी से बाहर
एक-एक ब्राह्मण होता॥
दरबदर भटकती फिरती
कर्मठ ऋषियों की सन्तान है॥4॥