ऐ ऋषि तूने, हलाहल पीकर
ऐ ऋषि तूने, हलाहल पीकर,
जिन्दगी दी हमको, दर्द में जी कर ।
तेरे एहसानों का बदला, ना चुका पायेंगे ।
सदियां गुजरेंगी तुमको, ना भुला पायेंगे ।।
अन्तरा – कोई खंजर दिखाता था,
कोई पत्थर बरसाता था,
कोई थे रोटी के लाले तो,
कोई जहर पीलाता था,
दुनियां का मेला था दयानन्द अकेला था-२
सारा जहाँ था एक तरफ और ऋषि
अलवेला था आर्य दिवानों से,
कितने परवानों से जगमगादि महफिल,
वेद के नारों से समा जो तुमने की रोशन
उसे फैलाएगें तेरे एहसानो… ।
विकट विजली चमकती हो,
भयंकर घन गरजता हो
उठी हो आन्धियां भीषण,
निरन्तर जल बरसता हो
सबनम के धारों में,
जल निधिखारों में आंधि हो या,
तुफान या जलते अंगारो में
हर तरफ घुमे मस्ति में झुमे
आज सारी दुनियाँ दर तेरा
चुमें तेरे बलिदानों की गाथा
आज हम गायेंगे तेरे एहसानो का… ।।










