उठो वैदिक नाद गुंजा दो

0
49

उठो वैदिक नाद गुंजा दो

उठो वैदिक नाद गुंजा दो,
बोलो जय ऋषि दयानन्द की।
जो सोते हैं उनको जगादो,
बोलो जय ऋषि दयानन्द की॥
आर्य है जो श्रेष्ठ है मनका।
स्वाध्यायी और स्वस्थ है तनका ॥
प्राणिमात्र का हित चाहता हो
लेके भाव चले अपने पनका ।
ये दिल में भाव जगादो ॥1॥
बोलो जय ऋषि…

सत्य असत्य का निर्णय करे जो।
अधर्म आचरण करता डरे जो ॥
राष्ट्र के हित में संभल-2 कर अपने,
एक-2 पग को धरे जो उसे
राष्ट्र का नेता बनादो ॥2॥
बोलो जय…

जो अपने ही सुख में सुखी है।
इतना ना जाने कौन दुखी है।
ऐसे मनहूसों से ही तो
राष्ट्र की सब प्रगति रुकी है।
मनु कहता है उनको सजा दो॥3॥
बोलो जय…

वेद की मर्यादा का उलंघन ।
जब-जब भी हुआ हिला सिंहासन॥
भारत में महाभारत हो गया जगा
धृतराष्ट्र में था पागलपन इस
पागलपन को हटादो ॥4॥
बोलो जय ऋषि…

राम के राज्य की आज भी चर्चा।
बीत चुका है कितना अरसा॥
बाल्मीकि की रामायण में
वैदिक धर्म की अमृत वर्षा ।
अमृतपान करा दो ॥5॥
बोलो जय ऋषि…

उठो ऋषि दयानन्द के दीवानो।
स्वार्थ को तजदो वेद की मानो।
विश्व शान्ति के अग्रदूत हो
कर्मठ अपने को पहिचानो।
ओ३म की ध्वज लहरादो॥6॥
बोलो जय ऋषि…