समाजिक नियम सुनोरी
समाजिक नियम सुनोरी,
वृथा क्यों भ्रमत फिरोरी।
प्रथम सत्य विद्या और उस से
जो पदार्थ प्रकटयोरी।
आदि मूल सब का परमेश्वर,
और कारण समझोरी ॥
रटन उस ही का करोरी ॥ वृथा० ॥ १ ॥
नियम दूसरा नियत यही है,
ईश्वर सब में रम्योरी।
सत्य आनन्द रूप निरञ्जन
सुष्टि का कर्त्ता लखोरी ॥
यान वाही सों धरोरी ॥ २ ॥
निराकार सर्वज्ञ अजन्मा,
अनुपम समझ पड़ोरी।
चेतन शुद्ध अमर निर्भय नित्य,
सोई उपास्य सब करोरी ॥
उठा जड़ मूर्त्ति धरोरी ॥ वृथा० ॥ ३ ॥
वेद सत्य विद्या का पुस्तक,
वाही को श्रवण करोरी।
सब आर्यों का परम धर्म है,
पढ़ना पढ़ाना वहोरी ॥
शान्ति आनन्द होरी ॥ वृथा० ॥ ४ ॥
उद्यत रहना उचित सर्वदा,
और आलस तजोरी।
सत्य का ग्रहण असत्य का
त्याग कर भवसिन्धु तरोरी ॥
यथार्थ ज्ञान गहोरी ॥ वृथा० ॥५ ॥
सत्यासत्य विचार कर्म सब,
धर्मानुसार करोरी।
शारीरिक आत्मिक सामाजिक,
उन्नति सदा करोरी ॥
जगत् उपकार रच्योरी ॥ वृथा० ॥ ६ ॥
सब से प्रीति पूर्वक मिल के,
यथा योग्य वर्त्तारी।
धर्मानुकूल न्याय से चल कर
चित्त से सत्य भरोरी ॥
अविद्या नष्ट करोरी ॥ वृथा० ॥ ७ ॥
विद्या वृद्धि करो सब जग में,
यही धर्म तुमरोरी।
अपनी ही उन्नति में नाहीं,
तुम सन्तुष्ट रहोरी ॥
किन्तु जग वृद्धि करोरी ॥ वृथा० ॥८॥
तन मन धन से समाजिक,
पालन नियम चहोरी।
हो परतन्त्र नियम पालन में
स्वार्थ स्वतन्त्र रहोरी ॥
चित्त में मग्न रहोरी ॥ वृथा० ॥ ९ ॥
“शर्मन” कर समाप्त इस पद को,
नहीं कुछ शेष रहोरी।
नियम दशों पूर्ण लिख दीने,
जो अभिलाश थी मेरी ॥
हुई पूर्ण यह होरी ॥ वृथा० ॥ १० ॥










