है ओ३म् नाम सुखदायी, चहूँ दिशी तेरी प्रभुताई…

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है ओ३म् नाम सुखदायी, चहूँ दिशी तेरी प्रभुताई…

तर्ज : बन चले राम रघुराई

है ओ३म् नाम सुखदायी, चहूँ दिशी तेरी प्रभुताई…

तेरी शरण सुहाई, है ओ३म् नाम…

प्रभु बिन सूना मन का मन्दिर, ज्ञान की ज्योत बुझाई…

विवश आत्मा बिलखत डोले, राह ना देत सुझाई

है ओ३म् नाम…

पाँचतत्व की मानुष काया, पाँच में जा के समाई

माटी का था पात्र ये नश्वर, काहे प्रीत लगाई

देह को समझा सुख का साथी, मोह में मति भरमाई

है ओ३म् नाम…

माटी के इस घर में प्रभुजी, ज्ञान का दीप जलाओ

दूर करो मन का अन्धियारा, ज्योतिमार्ग दिखाओ

हरो मोह माटी का मेरा, मोह बड़ा दुःखदाई

है ओ३म् नाम…

प्रीत मेरी तड़पे प्रभु तुझ बिन, ज्यूँ बछड़े बिन गाई

आनन्दन आनन्द रस भर दे, परम प्रीत मनभाई

है ओ३म् नाम…

(बिलखत) रोते हुए, विलाप करते हुए (अनुपम) विचित्र (आनन्दन) सुखकर, आनन्द देनेवाला