सिमरन करूँ ओ३म् का (2)
आनन्द जगे रोम रोम का ॥ सिमरन करूँ…
जीवों के लिए संसार दिया
कैसा अद्भुत उपकार किया
शरणागत का उद्धार किया
तुझसे बेहतर सखा प्रभु कौन सा ॥ सिमरन करूँ…
अन्धकार मिटे मेरे मन से
आत्मा हो प्रकाशित शम दम से
करूँ त्याग सदा तन मन धन से
जीवन है मिला अनमोल सा ॥ सिमरन करूँ…
दे दो सत्य ज्ञान की उजली किरन
पाऊँ जिससे प्रभु तेरी शरण छूटे दुःख कष्ट ये जन्म मरण
ज्ञान अमृत बहे तेरे सोम का ॥ सिमरन करूँ…
मेरी श्रद्धा विश्वास कहे
तेरा प्रेम सदा मेरे मन में बहे तेरी वेदवाणी से प्यार रहे
आशुतोष हैं तू प्रभु मोम सा ॥ सिमरन करूँ…










