सत्-चित्त-आनन्दस्वरूप पिता हमें दुःख से रिहा कर दे
सत्-चित्त-आनन्दस्वरूप पिता,
हमें दुःख से रिहा कर दे,
दीन बन्धु……. ॥ टेक ॥
सृष्टि का सृजन हार है तू,
और सबका पालन हार है तू,
निराकार नित्य न्याय नियन्ता,
सब जग का आधार है तू,
भक्ति का भण्डार है तू,
हम में भी शक्ति भर दे
दीन बन्धु.. ॥१॥
तू एक सभी से है,
सब तेरा भानु शशि सितारे सारे,
तू ही तेरा प्रकाश निराला है,
हमें ही उजियाला है,
चमकाने वाला है,
प्रकाश प्रखर दे
दीन बन्धु. …. ॥ २ ॥
बुद्धि बिन मानव ख्वार है यह,
भूमिपर भार है यह,
बुद्धि से ही कर सकता है,
जीवन का उद्धार यह,
विनती बारम्बार है यह,
हमें बुद्धि का वर दे
दीन बन्धु…. ॥३॥
वाणी से जो कथन करे,
करने का वही यतन करे,
ताराचन्द उत्थान करें,
हम ना जीवन का पतन करें,
संचय शुभ गुण रतन करे,
दुर्गण सब हर दे
दीन बन्धु.. ॥ ४ ॥










