दिलों की तह में ऋषि अपनी याद छोड़ गए
गए तो ऐसी अनोखी बहार छोड़ गए ॥
जुबाँ से कुछ न कहा अपने दुःख के बारे में
पराए दुःख में ऋषि सुख का साथ छोड़ गए ॥ गए तो….
हजारों कष्ट भी ऋषि के कदम पलट ना सके
धरम पे चलते कदम त्याग तप की ओर बढ़े ॥ गए तो….
उधर अधर्म इधर महर्षि अकेला था
ऋषि के सत्य के आगे अधर्मी दौड़ गए ॥ गए तो….
इसी ख्याल से ऋषि ने बनाया आर्य समाज
हरेक आर्य को वैदिक धर्म से जोड़ गए ॥
ऋषि को विष में भी अमृत दया के छूट दीखे
घातक की बेड़ियाँ अपनी दया से तोड़ गए ॥ गए तो !!
दया थी दिल में हँसी मुख पे जाँ सफर पर थी
‘प्रभु की इच्छा’ थी प्रभु से वो नाता जोड़ गए ॥ गए तो !!










