दयानन्द क्या करूँ वैदिक धर्म आगे चलाना है
मेरे आगे तेरा आदर्श जो जीवन भर निभाना है ॥ दयानन्द !!
जमाने भर में तेरा नाम और चर्चा है ऐ ऋषिवर
अभी तो नाम का चर्चा बहुत ही दूर जाना है | मेरे आगे !!
तेरे कष्टोंसे मुखरित हो गया आर्यों का भारत देश
तेरे इस त्याग का जादू जमाने पर चलाना है ॥ मेरे आगे ॥
जहालत से भरे जग का बना था तू ऋषि रहबर
ये हालत फिर से आई है जहालत को मिटाना है ॥ मेरे आगे ॥
तेरे तर्कों के तरकस ने मिटा डाले भ्रमों के जाल
भ्रमों के जाल और जंजाल को जगसे मिटाना है ॥ मेरे आगे !!
जो पत्थर ईंट खाई तुमने ऋषिवर अपने सीने पर
जमाकर जतन से इनको दया का महल बना है ॥ मेरे आगे ॥
मुसलमा जैनी सिक्ख हिन्दू ईसाई को बना बन्धु
ऋषि के ओ३म् के झण्डे तले लाकर मिलाना है ॥ मेरे आगे !!
जो हँस के त्याग से ऋषि ने लगा दी प्राण की बाजी
वो प्राण इक प्रण में बदलेगा यहीं से आगे जाना है ॥ मेरे आगे ॥
सच्चाई का सजग डंका जो ऋषिवर ने बजाया था
वो डंका आखिरी दम और कदम तक बजते जाना है । मेरे आगे ॥
बनाई और बनाकर बाँध दी कड़ी प्रेम की ऋषि ने
कड़ी मेहनत से जो बन गई कड़ी उसको बढ़ाना है ॥ मेरे आगे ॥
चले काँटो की राहों पर मगर हम को दिए हैं फूल
जो आएँ कष्ट फूलों की तरह यूँ मुस्कुराना है ॥ मेरे आगे
दशा जो देख भारत की बहाए दर्द के आँसू
उस इक इक मोती की कीमत ‘ललित’ हमको चुकाना है ॥
मेरे आगे ॥










