जिसने स्वयं पिया विष अमृत धारा हमें पिलाई है

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जिसने स्वयं पिया विष अमृत धारा हमें पिलाई है

जिसने स्वयं पिया विष,
अमृत धारा हमें पिलाई है
उसी ऋषि की याद दिलाने,
आज दीवाली आई है।।

पाखण्डों की घोर घटा में,
जो बिजली बन कर चमका
कुकृत्यों की कलुष कालिमा पर,
जो घन बनकर वरसा।
युग-युग का धो पाप पंक
की जिसने सही सफाई है।।

पीड़ित मानवता के आंसू
पोंछ जिसने त्राण दिया
भौतिकता से भीत विश्व को,
फिर आध्यात्म ज्ञान दिया।
इति भीति से शून्य स्वस्ति,
वेदों की राह दिखाई है।।

मिथ्यावादी न देते ये पढ़ने
का अधिकार हमें पैरों की
जूती कह ठुकराता यह
निष्ठुर संसार हमें।
मातृशक्ति की जिसने फिर
मिटती मर्याद बचायी है।।

जिसके पावन दया दान से
कोई भी न रहा वंचित क्या
विधवा क्या पद दलित अनाथ,
अछूत और निष्कासित ।
जिसने गौओं के हित
गौकरुणा-निधि बनायी है।।