महाधन शहीद श्री फकीरचन्द जी

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“स जीवति यशो यस्य, कीर्तिर्यस्य स जीवति।”
(वही वास्तव में जीवित रहता है जिसकी कीर्ति संसार में अमर रहती है।)


🏡 जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि

श्री फकीरचन्द जी का जन्म हरियाणा राज्य के जिला करनाल, तहसील कैथल के प्रसिद्ध गाँव सेरधा में हुआ था। आपके पिताजी का नाम श्री बालाराम जी था। जातिगत रूप से आप चमार समाज से थे, परंतु आपका संपूर्ण परिवार वैदिक धर्म का दृढ़ अनुयायी था। यह दर्शाता है कि जाति या सामाजिक स्थिति से ऊपर उठकर धर्मनिष्ठ व्यक्ति राष्ट्र और समाज के लिए कितनी महान प्रेरणा बन सकता है।


📖 शिक्षा एवं धर्मनिष्ठा

श्री फकीरचन्द जी शिक्षित थे और आर्य भाषा (संस्कृत एवं वैदिक साहित्य) में भी पारंगत थे। उन्होंने समाज सुधार, धर्म प्रचार और राष्ट्रीय चेतना में सदैव रुचि ली।


✊ हैदराबाद सत्याग्रह में योगदान

सन् 1939 में जब हैदराबाद सत्याग्रह का बिगुल बजा, तब फकीरचन्द जी केवल 22 वर्ष के थे। परिवारवालों ने उन्हें सत्याग्रह में भाग लेने से रोकने का हर संभव प्रयास किया, परंतु उनके मन में देश, धर्म और स्वराज्य के लिए जो अग्नि धधक रही थी, उसे कोई रोक न सका।

घर से दौड़ते हुए वे कैथल में काकाराम जी के जत्थे में जा मिले और वहीं से अपने साथी सत्याग्रहियों के साथ हैदराबाद रवाना हो गए।


🚩 बलिदान की अमर गाथा

5 जून 1939 को उन्होंने प्रसिद्ध आर्य नेता श्री महाशय कृष्ण जी के साथ मिलकर औरंगाबाद में सत्याग्रह किया। इसके परिणामस्वरूप दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया।जेल में रहते हुए श्री फकीरचन्द जी को उदर पीड़ा शुरू हुई, जो धीरे-धीरे गंभीर होती गई और उसने अपेंडिसाइटिस का रूप ले लिया। उन्हें सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ 30 जून 1939 को उनका ऑपरेशन हुआ। दुर्भाग्यवश ऑपरेशन के बाद समुचित देखभाल न होने के कारण 1 जुलाई 1939 की प्रातः 7 बजे उन्होंने वीरगति प्राप्त की।


🕊 परिवार एवं स्मृति

श्री फकीरचन्द जी अपने पीछे धर्मपत्नी और दो पुत्रों को छोड़ गए। उनके परिवार की देखभाल हेतु सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा द्वारा उन्हें ₹11 मासिक पेंशन दी जाती है।उनका बलिदान केवल एक परिवार की नहीं, अपितु संपूर्ण आर्य समाज और वैदिक धर्म का गर्व है। समाज उनके नाम और त्याग को युगों-युगों तक स्मरण करता रहेगा।


🔥 नमन है ऐसे धर्मवीर को

जिन्होंने युवावस्था में ही धर्म, देश और समाज के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। श्री फकीरचन्द जी जैसे अमर बलिदानियों की गाथाएँ नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत हैं।


🌿 “धन्य है वह भूमि जहाँ ऐसे बलिदानी जन्म लेते हैं।” 🌿