श्री छोटेलाल जी

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“संसार हेतु शतवार सहर्ष मरें हम।”
यह पंक्ति उस तपस्वी, धर्मवीर और सच्चे देशभक्त पर सटीक बैठती है — श्री छोटेलाल जी, जिनका जीवन वैदिक धर्म, ब्रह्मचर्य, त्याग और बलिदान की अनुपम गाथा है।

🕉 उपनाम: तपस्वी शहीद श्री छोटेलाल जी

जन्म: मार्गशीर्ष शुक्ला १०, संवत् १९६१ वि०

बलिदान: ३ मई १९३८, गुलबर्गा जेल, हैदराबाद

प्रेरणा स्रोत: सत्यार्थ प्रकाश, वैदिक धर्म

आदर्श: ब्रह्मचर्य, सेवा, धर्मरक्षा

प्रेरक पंक्ति: “संसार हेतु शतवार सहर्ष मरें हम”

🔹 जन्म व पारिवारिक पृष्ठभूमि

श्री छोटेलाल जी का जन्म मार्गशीर्ष शुक्ला १०, शनिवार, संवत् १९६१ वि. (1904 ई. के लगभग) को ग्राम अलालपुर, जनपद मैनपुरी (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उनके पिताजी पं. सभोक्षेप्रसाद जी धार्मिक विचारों वाले, परिश्रमी पुरुष थे। लेकिन दुर्भाग्यवश जब छोटेलाल जी बाल्यावस्था में थे तभी पिता का देहान्त हो गया। परिवार का पालन-पोषण करने की जिम्मेदारी उनकी माता त्रिवेणी देवी और चाचा श्री जमुनाप्रसाद जी पर आ गई।

🔹 आध्यात्मिक झुकाव व वैदिक मार्ग पर प्रवेश

बचपन से ही छोटेलाल जी का हृदय साधु-संतों की ओर आकर्षित होता था। वे संन्यासियों को देखकर स्वयं भी वैसा ही वेश बनाकर अपने साथियों के साथ भजन-कीर्तन किया करते थे। भयंकर गरीबी के कारण वे औपचारिक शिक्षा नहीं प्राप्त कर सके, किंतु उन्होंने गाँववालों से नागरी लिपि और ग्रंथों का स्वाध्याय किया।

धीरे-धीरे उन्होंने रामायण, गीता और सत्यार्थ प्रकाश का अध्ययन किया। वे सदा ब्रह्मचर्य का पालन करते रहे। दिन में खेतों पर श्रम, रात में साधना। खादी का एक ही जोड़ा वस्त्र, कम्बल और जमीन पर सोना — यही उनका तपस्वी जीवन था।

🔹 आर्य समाज और शुद्धि आंदोलन

अलालपुर के पास नाहिली ग्राम में एक आर्य समाज की स्थापना हुई। श्री छोटेलाल जी ने उसमें सक्रिय भागीदारी निभाई। उन्होंने जाटव समाज में हो रहे ईसाई धर्म परिवर्तन को रोका और कुँवर लालसिंह जी के साथ मिलकर कई परिवारों को पुनः वैदिक धर्म में दीक्षित किया।

🔹 हैदराबाद सत्याग्रह और बलिदान

1938 में जब निज़ाम के अत्याचारों के विरुद्ध हैदराबाद सत्याग्रह का बिगुल फूँका गया, तो श्री छोटेलाल जी ने धर्मरक्षा हेतु अपने जीवन की आहुति देने का संकल्प लिया। वे पं. घुरेन्द्र शास्त्री जी के साथ सत्याग्रह हेतु विशेष रेल से रवाना हुए।
22 अप्रैल 1938 को उन्होंने गुलबर्गा में सत्याग्रह किया और जेल भेजे गए।

🔹 शहादत की अमर गाथा

जेल में उन्हें लू लग गई, परंतु उचित इलाज न मिलने के कारण उनकी स्थिति बिगड़ती गई।
3 मई 1938 की प्रातः उन्होंने वीरगति प्राप्त की।
उनकी शवयात्रा तक सरकार ने गुप्त रखी। लेकिन सत्य की आवाज़ कभी नहीं दबती — उनकी शहादत आर्यसमाज की प्रेरणा बन गई।

🔹 माँ का ममत्व और महान त्याग

जब पं. घुरेन्द्र शास्त्री जी उनके गांव पहुंचे तो उनकी माँ त्रिवेणी देवी फूट-फूटकर रो पड़ीं। बोलीं —
“मैं इसलिये नहीं रोती कि मेरा पुत्र धर्मयुद्ध में मरा। मैं इसलिये रोती हूँ कि अब यदि सत्याग्रह हो तो मैं किसे भेजूँगी?”
ऐसा था एक आर्य माता का हृदय!

आज भी उनकी स्मृति में सार्वदेशिक सभा उनकी माता और बहन को पेंशन देती है।